बुधवार, 21 अगस्त 2013

माॅ

माॅ
जीवन
जीवन पथ्
जीवन दिशा
जीवन सन्देश्
है ।


माॅ
निश्छल
निर्विकार
निर्सगत
निर्स्वाथ्र्
है। 


 
माॅ
सुख्
पथ्
दिशा
शिक्षा
है।

माॅ
रमजान का राैजा
इद का मिलाद
मुहर्रम की श्हादत
अल्लाह की इबादत
हेे।
माॅ
मीठी
याद,
स्मर्ति
डाॅट
है


माॅ
सदमार्ग की सरिता
गु णाे की ख्।न
जीवन रक्षा कवच
ममता की सरगम
हे। 


 
माॅ
तपन मै ठडक
बरसात मै छतरी
जाडै मै शाााल
रेगिस्तान मे जल है .

माॅ
प्यार की थ्पकी
स्नेह की बाती
लाड की डै।री
दुलार की लै।री
है ।

माॅ
कबीर की वाणीीीी
साइ की सीख्
गाॅघीी की अहिसा
नानक का सदैश्
इसा की रै।श्नी
महावीर की दीक्षा
है ।

माॅ
बलि दान की पन्नाधाय
वात्सल्य की यशाैैदा
जीवन कीी विश्व्।कर्मा
शििक्षाा की कुबैर
वीरता की दुर्गा
त्याग् कीी सीीताा
पेर्र्र्म कीी मीीरा

पवित्रता की घोतक नारियां

   पवित्रता की घोतक नारियां

                                            रमण महषिZ ने कहा है कि पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील विश्व के लिए छाया तथा जीवमात्र के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम नारी है। नारी सृष्टि के प्रारंभ से ही अनत गुणों से भरपूर रही है। उसमें सूर्य सा तेज, चद्रमा जैसी शीतलता पृथ्वी की सी क्षमा, पर्वतों सी मानसिक उच्चता एक साथ दृष्टिगोचर होती है। नारी प्रकृति की जननी है। नलिन ने कहा है कि नारी सृष्टि की परम सौंदर्यमयी सर्वश्रेष्ठ कृति है।सृजन के आदि से विश्वस उसकी गोद में क्रीड़ा करता आ रहा है। उसकी मधुमती मुस्कान में महानिर्माण के स्वप्न है। और भू भं्रग में विनाश की प्रलयकारी घटाएं। इस तरह नारी अनंत गुणों से भरपूर है, फिर भी समाज उसका शोषण करता चला आ रहा है। कल की घर की चहारदीवारियों में कैद नारीहोया आज की तेजतर्राट स्वच्छंद नारी सभी को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

                                      नारी युगों से अपमानित होती चली आ रही है। जिसे कविवर मैथिलीशरण गुप्त ने अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में हेै दूध और ऑंखों में पानी कहकर प्रकट किया है। नारी को समाज में अबला माना जाता है। जिसका काम बच्चों को पैदा कर उसका पालन पोषण हीसमझा जाता है। नारी में सहनशक्ति की इतनी असीमित शक्ति रहती है कि वह कितना भी सताए जाने पर उफ तक नहीं करती है।तभी महादेवी वर्मा ने कहा है कि युगोंे से पुरूष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नही सहनशक्ति के लिए दंड देता आा रहा है। नारी में सहनशक्ति की ताकत अब देखने मिलती है जब उसकी बिना मर्जी के कहीं भी शादीकर दी जाती है। विधवा हो जाने पर समाज के उपेक्षा सहना उसका पति उसके साथ चाहे जैसा भी सुलूक करे ।


                                           वैसे साईरस ने सच कहा है कि नारी या तो प्रेम करती है याघृणा ही उसके बीच का मार्ग उसे ज्ञात नहीं। नारीजब किसी से प्रेम करती है तो अपनी सांसोंसे बढ़कर चाहती है। उसकी छायामात्र ही उसे पुलकित कर देती है। लेकिन अगर वह किसी से घृणा करने लग जाए तो दुनिया की कोई भी ताकत उसका विचार नहीं बदल सकती। नारी या तो किसी से प्यार करती है या घृणा। वह उसके साथ छल, कपट, दुव्र्यवहार आदि नहीं करती है। वैसे नारी के बारे में कहा जाता है कि वह जानबूझकर पुरूषों के हाथों समर्पित हो जाना चाहती है।

                                           तभी तो कवयित्री महादेवी वर्मा नेकहा है कि काव्य और प्रेम दोनों नारी हृदय की संपत्ति है। पुरूष विजय का भूखा होता है। नारी सर्मपण की पुरूष लूटना चाहता हेै नारी लुट जाना सही बात है जब नारी के कोमल प्यार रूपी झरने के रस को पुरूष अपना बनाना चाहता है तब उसके वशीभूत हो नारी अपना सब कुछ त्यागकर उसे अपना तन मन धन सभी लुटा बैठती है। और अपने उस पुरूष मित्र को हृदय के मंदिर का देवता मानकर पूजती है।तभी तो पंचतंत्र में कहा गया है किक चंद्रमा की कलाओं की भांति नारी का हृदय भी सदैव परिवर्तनशील होता है। किंतु इसमें सदा एक ही पुरूष का वास रहता है। जब नारी किसी को मनमंदिर का देवता मान लेती है तब सिर्फ उसे ही अपनी सेवा के सुमन अर्पित करती है। पह पुरूष की ओर आंख उठाकर देखना भी वह पाप समझती है। पवित्रता की घोतक नारियां

नारियां पवित्रता की घोतक है। सीता सावित्री, शकुतला आदि कितनी ही नारियों की पवित्रता के आगे संसार नतमस्तक है। आज संसार के जितने भी धार्मिक कृत्य है। सब नारियों की बदोेैलत ही जिंदा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को कहना पड़ा कि जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है, िस़्त्रयां उसकी विशेष संरक्षिकाएं है। नारी की पवित्रता ही उसकी सबसे बड़ीपूंजी है

नोबल पुरूस्कार विजेता कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि पवित्र नारी सृष्टिकर्ता की सर्वोत्तम कृति होती है। वह सृष्टि के संपूर्ण सौंदर्य को आत्मसात किए रहती है। पवित्र नारी का हृदय पवित्रता का आगार बन जाता है, उस समय उससे अधिक कोमल वस्तु संसार में नहंी रह जाती हेै। नारी की पवित्रता उसके त्याग, बलिदान, सर्मपण, साहस, वीरता आदि से अलग दृष्टिगोचर होती है।

नारी के चरित्र की गणना उसकी आंखो में होती है। जिसमें शर्महया के भाव रहते है। उन्हीं के आधार पर की जाती है। जिस नारी को समाज मे घूमते देखा जाता है उसके बारे में समाज विपरीत धारणा बनालेता है। कोल्टन ने तो यहां तक कहा है कि लज्जा नारी का सबसे कीमती आभूषण है। चरित्रहीन नारी का समाज में कोई स्थान नहीं है। लज्जाशील नारी की ही सर्वत्र इज्जत की जाती है। समाज भीं सम्मान की दृष्टि से देखता है।

गौेल्डिस्मथ ने कमाल की बात कही है कि कंटा भरी साख को फूल सुदर बना देते है और गरीब से गरीब आदमी के घर को लज्जावती नारी सुंदर और स्वर्ग बनादेती है।

नारी पुरूष संबंधों की बात आती है तो यह देखा गया है कि पुरूष नारी से संबंध बनाने के इच्छुक रहते है। लेकिन कुछ लोग शील और सदगुणों से भरपूर नारी से दूर रहना चाहते है। वैसे पुरानी किताबों में भी लिखा गया है कि जर,जमीन और जोरू ये तीनों झगड़े की जड़ है। ऐसे लोग नारी को झूठा मानते है। उसका संपर्क मिथ्या समझते है। उनकों नहीं मालूम रहता है कि नारी के रूप में सत्य उनकी परीक्षा ले रहा है। जैनेन्द्र कुमार ने कहा है कि जो स्त्री से अपने को बचाता है वह सच सें अपने को दूर रखता है।स्त्री झूठ नहीं है और पुरूष के लिए सच की चुनौती स्त्री के रूप में आती है। कुछ पुरूष ऐसे होते है जो नारी के पीछे भागते है। तो ऐसे पुरूषों की नारी अवहेलना करने लग जाए तो यह बात उसके लिए सबसे अधिक असहनीय होती है इस संबध में चैफर्ट ने कहा हेै कि नारी पुरूष की छायामात्र है । उसको पाने का प्रयास करो तो वह दूर भागती है यदि उससे पलायन करो तो वह अनुसरण करती है।वैसे पुरूष के चरित्र की परीक्षा नारी के संपर्क मे आने पर ही होती है।

तभी तो दार्शनिक गेटे ने कहा है कि नारियों का संपर्क ही उत्तम शील की आधारशिला है।

शीलवती नारियों के सपंर्क में आकर ही पुरूष चरित्रवान धैर्यवान एवं तेजस्वी बनता है नारी सम्मान की बात याद आती हेै तो हमारे पूर्वज मनु का कथन याद आता है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवना निवास रत होते है। यह बात सही है कि जिस समाज में िस्.त्रयों का स्थान उंचा है उसे श्रेष्ठ माना जाता है। हमारे यहां नारी को पैरों की जूती समझा जाता है। लेकिन अब कुछ परिस्थितियां बदल रही है फिर भी समाज में नारी की स्थिति में ंसतोषजनक सुधार हुआ है। आज भी वह अनमेल विवाह दहेज प्रथा, अंधविश्वासों, अशिक्षा आदि अनेक सामाकि कुरीतियों से घिरी है।

तभी तो प्रसि़़द्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चटटोपध्याय को कहना पड़ा कि चाहे कोईदेश चाहे कोई जाति हो जब समाज में नारी का स्तर नीचा हो जाता है तब उसके साथ शिशुअों का भी स्तर नीचा हो जाता है । सही बात है नारी सृष्टि की जननी है और जब सृष्टि की ही उपेक्षा की जाएगी तो वह उपेक्षित फल देगी ही।

प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने भी यही बात कही है कि स्त्री की उन्नति और अवनति पर ही राष्ट की उन्नति और अवनति निर्भर करती है।जब नारी को अपने परंपरागत मूल्यों सेहटते हुए देखता हूं तो स्टील का कथन याद आ जाता है कि संसार में एक नारी को जो करना है वह पुत्री बहन,पत्नी और माता के पावन कत्र्तव्यों के अंतर्गत आ जाता है। फिर भी पता नहीं क्यों आधुनिकता के चक्कर मे पड़ी नारी पश्चिमी देशों के बनाए हुए अंधे रास्ते पर चलकर ग्लैमर की दुनिया में खोना चाहती है। और यही वह कदम है जो पंरपरागत मूल्यों पर चलने वाली कल की नारी और आज की स्वच्छंद नारी में अंतर स्पष्ट करता है। भारतीय नारी भारतीय संस्कृति के परंपरागत मूल्यों को त्यागकर विदेशी नारी की नकल कर रही है। आज बनावट पैसे की चकाचौंध विज्ञापन की दुनिया व फिल्मी माध्यमों से प्रभावित नारी ने अपने सारे परंपरागत मूल्यों को धोकर अश्रृद्धा का रूप धारण कर लिया है। आज भी नारी को कविवर ु जयशंकर प्रसाद की एक बात याद रखनी होग कि नारी तुम केवल श्रृद्धा हो।

आज नारी स्वयं अपनी भूल से अनेक समस्याओं से घिर गयी है। उसकी समस्याओं का समाधान करना समाज का प्रथम कत्र्तव्य है। पुरूष प्रधान समाज को नारी का शोषण न करके उसकी उन्नति के लिए ईमानदारी से कार्य करना चाहिए। हमें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ़ऋणी नारी के है। प्रथम तोजीवन के लिए पुनश्च इसको जीने योग्य बनाने के लिए। आज नारी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होने देने के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह विवाह समस्या ने भी उग्र रूप धाराण कर लिया है। जिसके कारण दहेज प्रथा, अनमेल विवाह ,बाल विवाह आदि समस्याओं का सामना नारी को करना पडता है।

 आज भी नारी की एक मुख्य समस्या उसका अशिक्षित होना है जिसके कारण वह अनेक धार्मिक अंध विश्वासों, सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों एवं कुप्रथाओं से घिरी हुयी है। अत: आज समाज का कत्र्तव्य है कि वह इनकी समस्याओं का निराकरण करे । नारी मां पत्नी बहन पुत्री आदि के रूप मे अपने कत्र्तव्य को पूर्ण करने के लिए प्रयत्नशील है। लेकिन हमारा पुरूष प्रधान समाज अपना कत्र्तव्य पूरा नहीं कर पाता कि नारी को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाए। अत: समाज को अपना यह कत्र्तव्य पूर्ण करना चाहिए ताकि देश की उन्नति हो और न्यायोचित ढंग से नारी को उसका हक मिलें ।

नारी पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील, विश्व के लिए छाया तथा जीवमात्र के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम नारी है।

 नारी
महात्मा गांधी नारी से बहुत अधिक प्रभावित थे। महात्मागांधी के अनुसार नारी त्याग की मूर्ति है। जो कोई कार्य सही और शुद्ध भावना से करती है। तो पहाडों को भी हिला देती है

 नारी की धार्मिक प्रवृति को देखकर महात्मा गांधी को कहना पड़ा था कि जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है स्त्रियां उसकी विशेष संरक्षिकाएं है।

 नारी की नैतिकता के संबंध में बापू ने कहा है कि यदि बल से अभिप्राय पशुबल से है तो निश्चय निश्चयही पशुबल में नारी कम शक्तिशालीहै यदि शक्ति से अ भिप्राय नैतिक बल से है तो नारी पुरूष से कही अधिक श्रेष्ठ है।


चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने नारी को संसार का सार बताया है वह युवावस्था में पुरूष की प्रेमिका रहती है, प्रौढ़ की मित्र और वृद्ध की सेविका रहती है।

 सेविलि नारी के प्रमुख अस्त्र आसुओं से बहुत प्रभावित है। वे कहते है कि नारी के रूप मात्र में हमारे कानूनों से अधिक सरलता रहती है। उनके आसुंओं में हमारे तकोZ से अधिक शक्ति होती है। 

नारी के शर्महया गुणों से प्रभावित कोल्टन को कहना पड़ा कि लज्जा नारी का सबसे कीमती आभूषण है।

 अंग्रेज कवि गोल्डिस्मथ का कहना हेै कि कांटो भरी साख को फूल सुंदर बना देते है। और गरीब से गरीब आदमी के घर की लज्जावती स्त्री सुंदर और स्वर्ग के समान बना देती है। 

भारतीय नारी अपनी लज्जा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। शर्म उसका प्रिय गहना है, तभी तो विवेकानंद को कहना पड़ा कि भारतीय नारी का नारीत्व बहुत आर्कषक है।

 जयशंकर प्रसाद जैसे कवि नारी,तुम केवल श्रृद्धा हो कहकर चुप हो जाते है। मगर इन कम शब्दों में भी कितनी बड़ी बात है।

नारी को पुरूषों के गुणों की कसौटी बताते हुए दार्शनिक गेटे कहते है कि नारियों का संपर्क ही उत्तमशील की आधारशिला है। शीलवती नारियो के संपर्क में आकार ही पुरूष चरित्रवान, धैर्यवान, एवं तेजस्वी बनता है।

लेखक जैनेन्द्र कुमार नारी को पुरूष के लिए सच की कसौटी मानते हुए कहते है कि जो स्त्री से अपने को बचाता है, वह सच से अपने को सदैव दूर रखता है। स्त्री झूठ नहीं है। और पुरूष के लिए सच की चुनौती स्त्री के रूप में आती है।

 बाबी का तो कहना है कि ईश्वर के पश्चात हम सर्वाधिक ऋणी नारी के है। प्रथम तो जीवन के लिए पुनश्च उसको जीने योग्य बनाने के लिए

प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक विक्टर ह्यूगो ने कहा है कि मनुष्यों के पास दृष्टि होती है, नारी के पास दिव्यदृष्टि।

महषिZ रमण नारी के त्याग, ममता, गुणों, से प्रभावित होकर कहते है कि पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील, विश्व के लिए छाया तथा जीवमात्र के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम नारी है।

Z आचार्य चतुरसेन शास्त्री कहते है कि नारी जगत की एक पवित्र स्वर्गीय ज्योति है, त्याग उसका स्वभाव क्षमा प्रदान उसका धर्म सहनशीलता उसका व्रत और प्रेम उसका जीवन नारी के सबसे प्रभावशाली जननी के रूप से प्रभावित होकर कहते है कि नारी सृष्टि की परम सौन्दर्यमयी सर्वश्रेष्ठ कृतिहै। सृजन के आदि से विश्व उसकी गोद में क्रीड़ा करता आ रहा है। उसकी मधुमति मुस्कान में महानिर्माण का स्वप्न है ओैर भ्रमण में विनाश की प्रलयकारी घटायें।

प्रेम करने के नारी के अनूठे गुण से प्रभावित होकर कवियित्री महादेवी वर्माZZZ कहती है कि काव्य और प्रेम नारी हृदय की संपत्ति है। पुरूष विजय का भूखा होता है। नारी सर्मपण की पुरूष लूटना चाहता है नारी लुट जाना। 

मोपासा तो कहते है कि प्रेम किस प्रकार किया जाता है इसे कवेल नारियां ही जानती है। नारी की सुंदरता से प्रभावित हस्र्ट बोलर्ते है कि विश्व में कोई वस्तु इतनी मनोहर नहीं जितनी की सुशील और सुंदर नारी।
नारी का बातूनी होना आम बात है तभी तो मोलिना को कहना पड़ा कि नारी का होना और चुप रहना दो विरोधी बातें है। 

नारी की पवित्रता से प्रभावित नोबल पुरस्कार प्राप्त रविन्द्रनाथ टैगोर कहते है। पवित्र नारी सृष्टि की सर्वोत्तम कृति होती है। वह सृष्टि के संपूर्ण सौन्दर्य को अपने में आत्मसात किए रहती हेै।

नारी के संबंध में महापुरूषों की अपनी राय है। किसी ने उसे श्रृद्धा की देवी, किसी ने त्याग की मूर्ति, किसी ने पवित्रता का घोतक तो किसी ने पेरों की जूती ताड़न का अधिकारी बताया है।

 नारी की महिमा महापुरूषों ने अनेक रूपों में बतायी है। वैसे किसी ने कहा है कि हर महापुरूष की सफलता के पीछे किसी न किसी नारी का हाथ रहा है। मर्यादा पुरूषोत्तम राम की नींव यदि सीता पर आधारित है तो गांधी जी की महानता में कस्तूबा का हाथ कम नहीं है। तुलसीदास को महान बनाने में रत्नावली का हाथ माना जाता है। जब महापुरूषों की सफलता के पीछे नारी का इतना हाथ है तो वे नार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे होगें। 

इस तरह देश विदेश के अनेक विद्वानों , कवियों, लेखकों ने नारी के संबंध में विचार प्रकट किए है। सभी उसके अलग अलग रूपों से प्रभावित हुए दिखते है। नारी को अनंत गुणों से भरपूर इस पृथ्वी की सर्वश्रेष्ठ रचना माना जा सकता है। 


इतना सब कुछ होते हुए भी समाज में नारी की दशा दयनीय है। वह दहेज प्रथा, अशिक्षा, अंध विश्वासी रूढ़ियों प्रथाओंआदि सामाजिक बुराईयों से घिरी है। उसे तुलसीदास के त्रेता युग के समाज आज इक्कीसवीं सदी में प्रवेशकरते भारत में ताड़ना, का अधिकारी मानाजा रहा है। 

परिस्थियां बदल गयी है। नारी काम कर रही है। पुरूषों के साथ चल रही है। फिर भी उसे अनपढ़ होने के कारण गंवार, उपेक्षित होने के कारण शूद्र अनार्थिक जीव के कारण ढोर के समकक्ष रखा जा रहा है। आज नारी होशियर सामथ्र्यवान है फिर भी नारी को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। अत: हमारा यह कत्र्तव्य बनता है कि हम इन महापुरूषों से कुछ सीखें व नारी को समाज मे सम्मानजनक स्थान प्रदान करें

‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी

                   ‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी 

                        गोस्वामी तुलसीदास का नाम भारत में बडी श्रद्धा से लिया जाता है।उनके द्वारा लिखित रामायण, महाकाव्य की गणना विश्व के बडे और प्राचीनमहाकाव्यों में होती है। हमारे देश में घर-घर रामायण को बडे चाव और श्रद्धा केसाथ पढा जाता है। यही कारण है कि जब भी नारी के संबंध में कोई बात चलतीहै तो उसे वह नीचा दिखाने के लिए लोग सीना ठोंककर तुलसीदास का उलाहना
देकर कहते हैं कि ‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताडन के अधिकारी।‘कहने को तो हम लोगों ने कह दिया, लेकिन हम यह बात नहीं समझते हैंकि हम लोग किस द्वापर और त्रेता युग की बात कर रहे है। जब मनुष्य के पासपहनने को वस्त्र नहीं थे, वह वृक्ष की छाल लपेटता था, घास-फूस के झोपडे मेंजीवन यापन करता था। आज जबकि हम इक्कीसवीं सदी के द्वार पर खडे है तथा
नारी, स्कूल, कॉलेजों, दफ्तरों से एवरेस्ट पर पहुंच गई हैं, तब हमको यह बातअच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि तुलसीदास ने यह बात उस नारी के लिएकहीं थी जो घर की सात दीवारों के बीच कैद घुट-घुटकर जीवन जीती थी। वह
अशिक्षित थी, तभी तो उसे तुलसीदास ने गंवार कहा था।
आज परिस्थितियां बदल गई हैं, नारी बहुत शिक्षित हो गई है। तुलसीदास
के समय नारी समाज के सबसे निम्नतम वर्ग ‘शूद्र‘ के समान उपेक्षित थी, उसकी न
तो कोई बात सुनी जाती थी, न ही मानी जाती थी, उसका काम सिर्फ बच्चे पैदा
करना और परिवार का लालन-पालन करना था। आज की तरह जीवन के हर क्षेत्र
में उपयोगी नारी उस समय नहीं थी, तभी तो तुलसीदास ने उसे शूद्र के समान
मान लिया। इसी तरह तुलसीदास के समय की नारी मां-बाप पर आश्रित थी,
उनकी मर्जी के बिना वह कुछ नहीं कह सकती थी, उनकी इच्छा ही उसकी इच्छा
थी। वह उस जानवर के समान थी, जिसका मालिक उसे किसी भी खूंटे से बांध
सकता था। उसका विवाह बिना उसकी मर्जी से किसी से भी कर दिया जाता थां
चाहे उसका पति बूढा हो, बहु विवाही हो, चोर, उचक्का , शराबी कोई भी हो। घर
वालों की मर्जी उसकी मर्जी होती थी परन्तु आज नारी को कानून से अधिकार प्राप्त
हैं, वह पुरूषों के बराबर हक रखती है, उसकी इच्छा का सम्मान किया जाता है,
उसे पशु की श्रेणी में रखना अपना मजाक उडाना होगा।
तुलसीदास के समय की नारी धन-उर्पाजन करने में असफल थी, घर की
आय में आर्थिक रूप से उसका कोई योगदान नहीं था, चूल्हा, चौकी के सिवा वह
कुछ जानती भी नहीं थी, इसलिए तुलसीदास ने उसे ढोर के समकक्ष रखा था।
आज जबकि नारी अपने पैरांे पर खडी है, कारखानों, दफ्तरों, हवाई जहाज, रेल
आदि में नारियां काम कर रही हैं, स्कूल , कालेजों में सफलतापूर्वक पढा रही है।
वह अब बहुत होशियार , कार्यशील , पुरूषों के समान सामर्थ्य वाली हो गई है।
आज कितनी नारियों को अपने पिता के रिटायरमेंट के बाद घर को चलाना पड
रहा है, कितनी विवाहित औरतें अपने घर को मजबूत आर्थिक आधार प्रदान कर रही
हैं।
इन सब बातों से स्पष्ट है कि तुलसीदास के समय की नारी के समान आज
की नारी नहीं है। आज नारी अशिक्षित नहीं है, फिर उसे गंवार क्यों कहा जाये न
ही वह समाज में उपेक्षित है, जो उसे शूद्र कहा जाये। नारी बहुत कुछ कर रही है।
उसे पशु के समतुल्य समझना बेईमानी है। अब नारी अकर्मण्य भी नहीं है। वह
परिवार के लालन-पालन के साथ बहुत कुछ करना जानती है, फिर उसे ढोर
समझने की गलती क्यों की जाये। ये सब बातें हमें पूर्वाग्रह से ग्रसित , शिक्षित ,
वैज्ञानिक युग के रॉकेट में यात्रा करने वाले, आधुनिकतम मनुष्य की समझ में नहीं
आ रही है। नारी को ढोर, गंवार, शूद्र, पशु के साथ न रखकर शिथिल होशियार ,
कार्यशील सम्मानीय लोगांे की श्रेणी में रखा जाये। वैसे एक बात लोगों की समझ में
नहीं आ रही है कि सीख से ही 1⁄4 उनकी पत्नी रत्नावली 1⁄2 इतने बडे विद्वान
कहलाने वाले ने ये बात किस आधार पर कही, शायद वे भी पुरूष प्रधान समाज में
पूर्वग्रह से ग्रसित रहे होंगे।
मेरे कहने का मतलब यही है कि हम कल की तुलसीदास के युग की
रोती-धोती पुरातनी नारी की तस्वीर को भूल जायें और आज की होशियार ,
शिक्षित , सामर्थ्यवान, सम्मानीय कार्यशील नारी की तस्वीर को याद रखें , तभी हम
‘सृष्टि की जननी , दया, ममता, त्याग , वीरता की मूर्ति , पवित्रता की द्योतक
‘नारी‘ के साथ न्याय कर सकेंगे।