बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

पवित्रता की घोतक नारियां

   पवित्रता की घोतक नारियां

                                            रमण महषिZ ने कहा है कि पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील विश्व के लिए छाया तथा जीवमात्र के लिए करूणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम नारी है। 

नारी सृष्टि के प्रारंभ से ही अनत गुणों से भरपूर रही है। उसमें सूर्य सा तेज, चद्रमा जैसी शीतलता पृथ्वी की सी क्षमा, पर्वतों सी मानसिक उच्चता एक साथ दृष्टिगोचर होती है। नारी प्रकृति की जननी है।

 नलिन ने कहा है कि नारी सृष्टि की परम सौंदर्यमयी सर्वश्रेष्ठ कृति है।सृजन के आदि से विश्वस उसकी गोद में क्रीड़ा करता आ रहा है। उसकी मधुमती मुस्कान में महानिर्माण के स्वप्न है। और भू भं्रग में विनाश की प्रलयकारी घटाएं।

 इस तरह नारी अनंत गुणों से भरपूर है, फिर भी समाज उसका शोषण करता चला आ रहा है। कल की घर की चहारदीवारियों में कैद नारीहोया आज की तेजतर्राट स्वच्छंद नारी सभी को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

                                      नारी युगों से अपमानित होती चली आ रही है। जिसे कविवर मैथिलीशरण गुप्त ने अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में हेै दूध और ऑंखों में पानी कहकर प्रकट किया है। नारी को समाज में अबला माना जाता है। जिसका काम बच्चों को पैदा कर उसका पालन पोषण हीसमझा जाता है। नारी में सहनशक्ति की इतनी असीमित शक्ति रहती है कि वह कितना भी सताए जाने पर उफ तक नहीं करती है।

तभी महादेवी वर्मा ने कहा है कि युगोंे से पुरूष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नही सहनशक्ति के लिए दंड देता आा रहा है। नारी में सहनशक्ति की ताकत अब देखने मिलती है जब उसकी बिना मर्जी के कहीं भी शादीकर दी जाती है। विधवा हो जाने पर समाज के उपेक्षा सहना उसका पति उसके साथ चाहे जैसा भी सुलूक करे ।


                                           वैसे साईरस ने सच कहा है कि नारी या तो प्रेम करती है याघृणा ही उसके बीच का मार्ग उसे ज्ञात नहीं। नारीजब किसी से प्रेम करती है तो अपनी सांसोंसे बढ़कर चाहती है। उसकी छायामात्र ही उसे पुलकित कर देती है। लेकिन अगर वह किसी से घृणा करने लग जाए तो दुनिया की कोई भी ताकत उसका विचार नहीं बदल सकती।

 नारी या तो किसी से प्यार करती है या घृणा। वह उसके साथ छल, कपट, दुव्र्यवहार आदि नहीं करती है। वैसे नारी के बारे में कहा जाता है कि वह जानबूझकर पुरूषों के हाथों समर्पित हो जाना चाहती है।

                                           तभी तो कवयित्री महादेवी वर्मा नेकहा है कि काव्य और प्रेम दोनों नारी हृदय की संपत्ति है। पुरूष विजय का भूखा होता है। नारी सर्मपण की पुरूष लूटना चाहता हेै नारी लुट जाना सही बात है जब नारी के कोमल प्यार रूपी झरने के रस को पुरूष अपना बनाना चाहता है तब उसके वशीभूत हो नारी अपना सब कुछ त्यागकर उसे अपना तन मन धन सभी लुटा बैठती है। और अपने उस पुरूष मित्र को हृदय के मंदिर का देवता मानकर पूजती है।तभी तो पंचतंत्र में कहा गया है किक चंद्रमा की कलाओं की भांति नारी का हृदय भी सदैव परिवर्तनशील होता है। किंतु इसमें सदा एक ही पुरूष का वास रहता है। जब नारी किसी को मनमंदिर का देवता मान लेती है तब सिर्फ उसे ही अपनी सेवा के सुमन अर्पित करती है। पह पुरूष की ओर आंख उठाकर देखना भी वह पाप समझती है। पवित्रता की घोतक नारियां

नारियां पवित्रता की घोतक है। सीता सावित्री, शकुतला आदि कितनी ही नारियों की पवित्रता के आगे संसार नतमस्तक है। आज संसार के जितने भी धार्मिक कृत्य है। सब नारियों की बदोेैलत ही जिंदा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को कहना पड़ा कि जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है, िस़्त्रयां उसकी विशेष संरक्षिकाएं है। नारी की पवित्रता ही उसकी सबसे बड़ीपूंजी है

नोबल पुरूस्कार विजेता कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि पवित्र नारी सृष्टिकर्ता की सर्वोत्तम कृति होती है। वह सृष्टि के संपूर्ण सौंदर्य को आत्मसात किए रहती है। पवित्र नारी का हृदय पवित्रता का आगार बन जाता है, उस समय उससे अधिक कोमल वस्तु संसार में नहंी रह जाती हेै। नारी की पवित्रता उसके त्याग, बलिदान, सर्मपण, साहस, वीरता आदि से अलग दृष्टिगोचर होती है।

नारी के चरित्र की गणना उसकी आंखो में होती है। जिसमें शर्महया के भाव रहते है। उन्हीं के आधार पर की जाती है। जिस नारी को समाज मे घूमते देखा जाता है उसके बारे में समाज विपरीत धारणा बनालेता है। कोल्टन ने तो यहां तक कहा है कि लज्जा नारी का सबसे कीमती आभूषण है। चरित्रहीन नारी का समाज में कोई स्थान नहीं है। लज्जाशील नारी की ही सर्वत्र इज्जत की जाती है। समाज भीं सम्मान की दृष्टि से देखता है।

गौेल्डिस्मथ ने कमाल की बात कही है कि कंटा भरी साख को फूल सुदर बना देते है और गरीब से गरीब आदमी के घर को लज्जावती नारी सुंदर और स्वर्ग बनादेती है।

नारी पुरूष संबंधों की बात आती है तो यह देखा गया है कि पुरूष नारी से संबंध बनाने के इच्छुक रहते है। लेकिन कुछ लोग शील और सदगुणों से भरपूर नारी से दूर रहना चाहते है। वैसे पुरानी किताबों में भी लिखा गया है कि जर,जमीन और जोरू ये तीनों झगड़े की जड़ है।

 ऐसे लोग नारी को झूठा मानते है। उसका संपर्क मिथ्या समझते है। उनकों नहीं मालूम रहता है कि नारी के रूप में सत्य उनकी परीक्षा ले रहा है। जैनेन्द्र कुमार ने कहा है कि जो स्त्री से अपने को बचाता है वह सच सें अपने को दूर रखता है।स्त्री झूठ नहीं है और पुरूष के लिए सच की चुनौती स्त्री के रूप में आती है। कुछ पुरूष ऐसे होते है जो नारी के पीछे भागते है। तो ऐसे पुरूषों की नारी अवहेलना करने लग जाए तो यह बात उसके लिए सबसे अधिक असहनीय होती है इस संबध में चैफर्ट ने कहा हेै कि नारी पुरूष की छायामात्र है । उसको पाने का प्रयास करो तो वह दूर भागती है यदि उससे पलायन करो तो वह अनुसरण करती है।वैसे पुरूष के चरित्र की परीक्षा नारी के संपर्क मे आने पर ही होती है।

तभी तो दार्शनिक गेटे ने कहा है कि नारियों का संपर्क ही उत्तम शील की आधारशिला है।

शीलवती नारियों के सपंर्क में आकर ही पुरूष चरित्रवान धैर्यवान एवं तेजस्वी बनता है नारी सम्मान की बात याद आती हेै तो हमारे पूर्वज मनु का कथन याद आता है कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवना निवास रत होते है।

 यह बात सही है कि जिस समाज में िस्.त्रयों का स्थान उंचा है उसे श्रेष्ठ माना जाता है। हमारे यहां नारी को पैरों की जूती समझा जाता है। लेकिन अब कुछ परिस्थितियां बदल रही है फिर भी समाज में नारी की स्थिति में ंसतोषजनक सुधार हुआ है। आज भी वह अनमेल विवाह दहेज प्रथा, अंधविश्वासों, अशिक्षा आदि अनेक सामाकि कुरीतियों से घिरी है।

तभी तो प्रसि़़द्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चटटोपध्याय को कहना पड़ा कि चाहे कोईदेश चाहे कोई जाति हो जब समाज में नारी का स्तर नीचा हो जाता है तब उसके साथ शिशुअों का भी स्तर नीचा हो जाता है । सही बात है नारी सृष्टि की जननी है और जब सृष्टि की ही उपेक्षा की जाएगी तो वह उपेक्षित फल देगी ही।

प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने भी यही बात कही है कि स्त्री की उन्नति और अवनति पर ही राष्ट की उन्नति और अवनति निर्भर करती है।जब नारी को अपने परंपरागत मूल्यों सेहटते हुए देखता हूं तो स्टील का कथन याद आ जाता है कि संसार में एक नारी को जो करना है वह पुत्री बहन,पत्नी और माता के पावन कत्र्तव्यों के अंतर्गत आ जाता है। फिर भी पता नहीं क्यों आधुनिकता के चक्कर मे पड़ी नारी पश्चिमी देशों के बनाए हुए अंधे रास्ते पर चलकर ग्लैमर की दुनिया में खोना चाहती है। और यही वह कदम है जो पंरपरागत मूल्यों पर चलने वाली कल की नारी और आज की स्वच्छंद नारी में अंतर स्पष्ट करता है।

 भारतीय नारी भारतीय संस्कृति के परंपरागत मूल्यों को त्यागकर विदेशी नारी की नकल कर रही है। आज बनावट पैसे की चकाचौंध विज्ञापन की दुनिया व फिल्मी माध्यमों से प्रभावित नारी ने अपने सारे परंपरागत मूल्यों को धोकर अश्रृद्धा का रूप धारण कर लिया है। आज भी नारी को कविवर ु जयशंकर प्रसाद की एक बात याद रखनी होग कि नारी तुम केवल श्रृद्धा हो।

आज नारी स्वयं अपनी भूल से अनेक समस्याओं से घिर गयी है। उसकी समस्याओं का समाधान करना समाज का प्रथम कत्र्तव्य है। पुरूष प्रधान समाज को नारी का शोषण न करके उसकी उन्नति के लिए ईमानदारी से कार्य करना चाहिए। हमें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ़ऋणी नारी के है। प्रथम तोजीवन के लिए पुनश्च इसको जीने योग्य बनाने के लिए। आज नारी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होने देने के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह विवाह समस्या ने भी उग्र रूप धाराण कर लिया है। जिसके कारण दहेज प्रथा, अनमेल विवाह ,बाल विवाह आदि समस्याओं का सामना नारी को करना पडता है।

 आज भी नारी की एक मुख्य समस्या उसका अशिक्षित होना है जिसके कारण वह अनेक धार्मिक अंध विश्वासों, सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों एवं कुप्रथाओं से घिरी हुयी है। अत: आज समाज का कत्र्तव्य है कि वह इनकी समस्याओं का निराकरण करे । नारी मां पत्नी बहन पुत्री आदि के रूप मे अपने कत्र्तव्य को पूर्ण करने के लिए प्रयत्नशील है। लेकिन हमारा पुरूष प्रधान समाज अपना कत्र्तव्य पूरा नहीं कर पाता कि नारी को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाए। अत: समाज को अपना यह कत्र्तव्य पूर्ण करना चाहिए ताकि देश की उन्नति हो और न्यायोचित ढंग से नारी को उसका हक मिलें ।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

नारी एक रूप एक हजार एक

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                     नारी एक रूप एक हजार एक
      
        नारी एक है। उसके समाज में एक हजार एक रूप हैं। उसे समाज में स्त्री, वनिता, कलत्र, महिला, तिय, त्रिया, वामा, योगिता, वधु, अबला, ललना, कान्ता, रमणी, अगना, कामिनी, प्रमदा, सुन्दरी, गामिनी के रूप में जाना जाता है।         सुन्दरता का दूसरा नाम नारी है। नारी नाम ही सुन्दरता का प्रतीक है। उसे सुन्दरी, सुमुखी, प्रमदा, लालिका, सुनेत्रा, सुनयना, रमणी, कामिनी, ललना कहा जाता है।

        नारी का सर्वाेत्तम रूप माॅ का रूप है और माॅ के रूप में नारी सर्वत्र पूज्यनीय है। माॅ के रूप में उसे माता, अम्बा, माॅ, माई, मैया, जननी, जन्मदात्री, अम्बिका के रूप में जाना जाता है।

        बहिन के रूप में नारी का रूप त्याग और सेवा का है। इस रूप में उसे भगिनी, सहोदरा, स्वया, बहिन के रूप में जाना जाता है। एक ही गर्भ से पैदा होने के कारण वह सगर्भा, सजाता, सहोदरा, भगिन, सोदरा भी कहलाती है।

        पत्नि के रूप में नारी का त्याग, बलियन, दोस्त, हमदर्द, प्राणप्रिया, प्रेयसी के रूप में सामने आता है। साथ मरने, साथ जीने, सात जन्म तक साथ-साथ रहने की कसम के साथ जब नारी भगवान, खुदा, ईसा को गवाह मानकर पत्नि बनती है। तब उसका बीवी का रूप एक अलग जन्म नारी को देता है।

        पत्नि के रूप में उसका रूप भार्या, दारा, वामा, वल्लभा, सहगामिनी, जाया, सहचर्य, वधु, बहू, प्रिया, अंगना, कुलांगना, परिणीता, कलत्र, गृहणी, कुलजा, के रूप में समाज में जाना जाता है। विवाहित स्त्री को पति के जीवनकाल में सौभाग्यवती, सुहागिन, संधवा, समर्तका कहा जाता है।

        पत्नि बनने के बाद नारी माॅ बनती है उसके बच्चे होते हैं। वंश-वृ़क्ष बढ़ता है। पुत्र-पुत्रियाॅ पैदा होती हैं। पुत्रियों के रूप में नारी को पुत्री, तनया, बेटी, आत्मजा, सुता, अपत्या, नन्दिनी, कन्या, तनुजा के रूप में जाना जाता है।
        बालिका के रूप में वह कुमारी, गौरी, बेटी, किशोरी, कन्या और युवावस्था तरूणी, सुंदरी, श्यामा के रूप मंे जानी जाती है। बड़ी होकर नारी सखी, सहेली, अमली, सहरन्द्री, सहचरी, राजकी कहलाती है। नौकरी करने पर उसे परिचारिका, अनुचरी, किफरी कहा जाता है। 

        हमारे समाज में नारी को देवता का स्थान दिया गया है और उसे विद्या की देवी सरस्वती के रूप में गिरा, भारती, वीणा-पाणी, शाखा, वार्गश, ब्राम्हणी, आशा, वाकू, महाश्वेता, विद्यात्री, वागीश्वरी, ईश्वरी के रूप में जाना जाता है।

        धन की देवी और भगवान विष्णु की अध्र्दांगिनी के रूप में उसे  लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। धन की देवी लक्ष्मी को कमला के रूप में जाना जाता है। पार्वती के रूप में उमा, गिरिजा, भवानी, गौरी, अम्बिका, शिवा,      के रूप में भगवान शिव की पत्नि के रूप में जाना जाता है। 

        शक्ति की उपासना के रूप में नारी को दुर्गा के रूप में पूजते हैं उसे नवदुर्गा के रूप में जाना जाता है। शैलपुत्री, ब्रहचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, आदिशक्ति, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री के रूप में जाना जाता है।
        राम की पत्नि सीता के रूप में त्याग की मूर्ती, अग्नि परीक्षा देने वाली लवकुश की जनक सीता को वैदेही, जानकी, जनक नन्दनी, रामप्रिया, जनकतनया, भूमिजा के रूप में जाना जाता है।

        इन्द्राणी के रूप में उसे शचि, पौलोगी, इन्द्रावधु, इन्द्रा, महिन्द्री, पुलोनशा, मदवानी, द्रोपदी के रूप में उसे दु्रपद, सुता, कृष्णा, पांचाली, यशासैनी, सैरन्ध्री के रूप में जाना जाता है।

        नारी को देवताओं में स्थान देते हुए उसे गंगा के रूप मंे सुरसाई, जान्हवी, मंदाकिनी, अलकनंदा, देवनदी, विष्णुपई, सुरधुनी, देवप्रभा, धु्रवनंदा, भागीरसी, जियभगा के रूप में जानी जाती है।

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध...................उत्तरदायी कौन ?

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                                                      महिलाओं के प्रति बढ़ते  अपराध...................उत्तरदायी कौन ?

    हम 20 वीं सदी के भारत से आज आधुनिक इक्कसवीं सदी के भारत में प्रवेश कर गये हैं, जहाॅ पर महिलाएॅ घर की चाहरदीवारी में न रहकर पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है और देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं।   

      आज आपको जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं दिखता जहाॅ पर महिलायें नजर न आये। देश और समाज की रक्षा करने में भी बराबर का योगदान और सेवा-पुलिस और सेना में भर्ती होकर दे रही हैं। परन्तु इन सबके बावजूद भी आज नारी को सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं हुआ है और उसे अनेक सामाजिक, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तथा उसके विरूद्ध समाज में अपराध, दहेज, बलात्कार, हत्या जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इन अपराधों में दिन ब दिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। 

        हम जिस गति से सामाजिक आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं, उतनी ही गति से हमारे समाज में महिलाओं के प्रति अपराधों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। देश में प्रतिवर्ष महिलाओं के प्रति अपराधों के अंाकड़े प्रकाशित होते हैं और उनसे स्पष्ट होता है, कि अपराध, बलात्कार, हत्या, दहेज एवं भ्रूण हत्या आदि मामले तेजी से बढ़ रहे हैं तथा इक्कीसवीं सदी में इनकी गति में कमी आने की गुंजाईश प्रतीत नहीं होती है। 

        हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी पूर्व की तरह ज्यों का त्यों है। आज भी हम अपने पुराने परम्परागत कुरीतियों, रूढि़यो, प्रथाओं, परम्पराओं से बाहर नहीं हो पाये हैं और महिलाओं का पैदा होना ही एक अभिशाप मानते हैं। 


        आज कितने माॅ-बाप हैं जो लड़की पैदा होने पर मिठाई बांटते हैं और लड़के की तरह खुशी मनाते हैं और यही कारण है, कि महिलाओं के प्रति समाज में अपराध निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। 


        अब तो गर्भ में ही परीक्षण कराकर लड़की की हत्या कर दी जाती है और उसे पैदा होने ही नहीं दिया जता है। यदि लड़की पैदा हो गई तो उसे लड़कों की तरह उच्च शिक्षा नहीं दिलाई जाती है और यदि लड़की पढ़-लिख गई तो उसकी मर्जी के बिना उसकी शादी-ब्याह कर दिया जाता है और शादी ब्याह में उसके परिवार वालों की हैसियत से ज्यादा दहेज की मांग की जाती है और दहेज दिये जाने के बाद भी यदि ससुराल वाले खुश नहीं हुए तो जलाकर मार डाला जाता है या इतना सताया जाता है, कि वह खुद आत्महत्या करने के लिये मजबूर हो जाती है।


        आज दहेज अपराध समाज में तेजी से बढ़ रहा है और इससे न केवल मध्यम वर्गीय बल्कि समाज का पढ़ा-लिखा उच्च वर्ग भी प्रभावित है और आई.एस. और आई.पी.एस. जैसे उच्च पद पर पदस्थ लोगों के समाज में पचास लाख, एक करोड़ शादी के रेट हैं। जो बाजार में बिकते सामानों की तरह फिक्स है। इसी से आज समाज में व्याप्त खोखलेपन का अन्दाज लगा सकते हैं। 


        आज भी हमारे समाज में बाल विवाह, सती प्रथा, बहुविवाह, देवदासी प्रथा, बेड़नी, प्रथा, वैश्यावृत्ति जैसी बुराईंया विद्यमान हैं और खुले आम हजारों की संख्या में एक साथ विवाह बाल विवाह होते हैं। धर्म की आड़ में एक पत्नि के रहते हुए दूसरी शादी कर ली जाती है और खुले आम लड़की को स्वर्ग पहुंचाने के उद्देश्य से पति की चिता में जला दिया जाता है। कुछ जातियों में लड़कियों को पैदा होते ही बचपन से वैश्यावृत्ति में लगा दिया जाता है और कुछ जगहों तो लड़कियों को भगवान को समर्पित करके देवदासी प्रथा के रूप में जीवन गुंजारने मजबूर किया जाता है। 

        हम आजादी के 60-65 साल बाद भी कुछ सामाजिक परिवर्तन नहीं कर पाये हैं और महिलाओं के प्रति हमारे नजरिये में कोई परिवर्तन नहीं आया है। हम इक्कीसवीं सदी में भी पहुंच गये हैं लेकिन आज भी हमारे समाज में सैकड़ों सालों से चली आ रही बुराईंया विद्यमान हैं। द्वापद युग की तरह चीर हरण किया जाता है, त्रेता युग की तरह उसकी अग्नि परीक्षा ली जाती है और अहिल्या की तरह उसे शिला बनना पड़ता है। 


        शासन ने महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिये कड़े कानून अवश्य बनाये हैं। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम जिनमें महत्वपूर्ण बाल विवाह अवरोध अधिनियम, महिलाओं का अश्लील निरूपण प्रतिषेध अधिनियम, सती निवारण अधिनियम जिनमें महत्वपूर्ण है।


        महिलाओं के प्रति प्रत्येक बुराई को अपराध की श्रेणी में माना है और हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, दहेज की मांग, कू्ररता, छेड़छाड़, अश्लील विज्ञापन, भू्रण हत्या, गर्भपात आदि अपराधों में कठोर दंड का प्रावधान है।


         हमारे समाज में शिक्षा की कमी, अधिकारों के प्रति जागरूकता न होने के कारण इन कानूनों को महिलाएॅ लाभ प्राप्त नहीं कर पाती हैं और अपराध सहती रहती है। इसके लिये आवश्यक है, कि वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहे और प्रत्येक बुराई का तीव्रता से विरोध कर प्रचलित संस्थाआंे मानव अधिकार आयोग, विधिक सेवा प्राधिकरण आदि का सहारा लेने का तेजी से उसका दमन करें।


        आज समाज में महिलाओं को जागृत करने राष्ट्रीय महिला आयोग, मानव अधिकार आयोग की रचना की गई है, जिनका कार्य महिलाओं के लिये प्राप्त कानून में प्राप्त रक्षा उपायों का क्रियान्वयन कराना, महिलाओं की दशा सुधारने का कार्य करना, महिलाओं को संरक्षण प्रदान करना, मार्गदर्शक सिद्धांत बनाना तथा   महिलाओं के विरूद्ध विभेद और अत्याचारों से उत्पन्न विशिष्ट समस्याओं का अध्ययन कर उन्हें दूर करना होगा तथा महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक विकास की योजना बनाना इन सब घटकों के माध्यम से महिलाओं के विकास में बाधक तत्वों को दूर किया जा सकता है और महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराकर उन्हें जागृत कर उनके विरूद्ध बढ़ रहे सामाजिक अपराधों को कम किया जा सकता है।

        मानव अधिकार आयोग के गठन से देश में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों और उनके प्रति होते अपराधों का विरोध करने पर अपराधों की संख्या में कमी आई है। यदि किसी संस्था, संगठन, सरकारी संस्था द्वारा महिलाओं के प्रति अपराध किया जाता है या महिला होने के कारण उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी जाती है। उनके प्रति अत्याचार किया जाता है, तो इस संबंध में राज्य मानव अधिकार की सहायता ली जा सकती है। उसे सूचना दिये जाने पर अविलंब कार्यवाही की जा सकती है।

        प्रत्येक जिले में माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश को मानव अधिकार हनन के मामलों की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है। जहाॅ पर शिकायतें भेजकर परिवाद दायर कर सहायता ली जा सकती है। मानव अधिकार आयोग ने अपनी कार्य प्रणाली के कारण समाज में गहरा स्थान बना लिया है और दिन-प्रतिदिन उसका महत्व बढ़ता जा रहा है।



शनिवार, 7 सितंबर 2013

डाॅ. आम्बेडकर और महिला उत्थान


           डाॅ. आम्बेडकर   और    महिला उत्थान

 
                                    डाॅ. आम्बेडकर के द्वारा हिन्दू महिलाओ के उत्थान और पतन नामक किताब में मनुस्मृति को हिन्दू महिला के पतन के लिए जिम्मेदार माना उनके अनुसार मनुस्मृति ने महिलाओ के जीवन में बहुत जहर खोला है और वह दास्ता परतंत्रता की देवी बन गई डाॅ0 आम्बेडकर ने मनुस्मृति में दिये कई उदाहरणों की व्याख्या करते हुए बताया है कि किस प्रकार स्त्री को मंदिर में देवी देवताओ को समर्पित कर देवदासी प्रथा की स्थापना की गई और यलाम्या, जोगनी, भागिन आदि रूपो में वह देवताओ को समर्पित की जाती थी। मंदिर के पुजारी , शहर के व्यापारी, अमीर, जमीदार उसका शारीरिक शोषण करते थे वह वैश्या का जीवन जीती थी।
 
                                                       मनुस्मृति के अनुसार कम उम्र में विवाह होने लगे बाल विवाह का नियम बन गया एकांत जीवन बिताने हेतु महिलाओ में पर्दा प्रथा का जन्म हुआ समाज में उनकी स्थिति शुद्र की तरह हो गई उन्हें अन्ध विश्वास की दलदल में धकेल कर पूण्य, फल, प्राप्त करना व्रत, उपवास, पूजा पाठ, तीर्थ यात्रा के अंध विश्वास को जगाया गया उनका कर्म पति की सेवा, पुत्र की नियति, परिवार कल्याण बताया गया

 
                                 धर्म के नाम पर महिलाओ को जाति से बहिष्कृत कर उनके साथ अन्ध विश्वास, अन्ध श्रृद्धा, कुप्रथा, ने तान्डव रूप धाकर कर लिया महिलाओ को समाज में पैरों की जूती, ढोर, गवार, शूद्र पशु बना दिया बच्चा जन्ने की मशीन बन गई एक महिला 8-8, 10-10 बच्चो को जन्म देकर अपना पूरा जीवन उनको पालने पोषने में निकाल देती थी


                                                  प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रीयों की स्थिति अच्छी थी मातृसत्ता थी। वैदिक काल में उन्हें शिक्षा काअधिकार प्राप्त था। वे वेदो की ज्ञाता थी पाणिनी, मैत्रीय, गार्गी, आदि महिलाएं शास्तार्थ की ज्ञाता थी महिलाओ के बिना कोई भी धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक कार्य, पूरा नहीं होता था। उन्हें शिक्षा-दिक्षा की छूट थी। वे अपनी मर्जी से पति चुन सकती थी। उन्हें पुरूषो के बराबर अधिकार प्राप्त थे। वे समाज में पूज्नीय थी

 
                                      लेकिन धीरे-धीरे भारतीय समाज में मनुस्मृति, गौतम ऋषि के श्राप के प्रभाव और अहिल्या के शिला बनने के साथ भारतीय समाज पितृसत्तात्मक हो गया और भारतीय नारी का बुरा युग प्रारंभ हो गया उसे बचपन में पिता पर, जवानी में पति पर, वृद्धा अवस्था में बेटो पर निर्भर बताते हुए पुरूष धर्म का पालन करने वाली स्त्री बना दिया गया उसे विद्वानो के द्वारा नीच, स्वभाव से मूर्ख, बेवकूफ, नरक का फाटक, पुरूषो को भ्रष्ट करने वाली और अमृत के भेष में जहर बताते हुए उसे ज्ञान शिक्षा जैसे सामाजिक अधिकारो से वंचित करते हुए पैरो की जूती बना दिया गया। ब्राम्हण वाद के नाम पर देवदासी प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह, अशिक्षा, पर्दाप्रथा, को बढावा दिया गया वह विवाह को संस्कार मानते हुए वह तलाक नहीं दे सकती थी पति का घर ही उसका घर होता था। मरने के साथ ही उसका शराबी कवबी पति से पिण्ड छूटता था। उससे वेदो का अध्ययन का अधिकार छुनकर उपन्यन संस्कार पर रोक लगा दी गई


                                                           ऐसे भारतीय समाज में अस्पृश्यता एक कलक और हिन्दू धर्म की बुराई के रूप में पैदा होकर समाज के नस-नस मंे रच-बस गई लडकी पैदा होना अभिशाप माना जाने लगा उसे पैदा होते ही मार दियाजाता था। लडके के जन्म पर शहनाई बजती थी और लडकी के जन्म पर मां को कोसा जाता था।
 
                                   ऐसे भारतीय समाज में डाॅ0 आम्बेडकर के द्वारा पूरे सामाजिक ढांचे को बदलना आवश्यक समझा था और इसके लिए महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को आधार बनाते हुए समाज सुधार की नींव रखी थी इसलिए उनके अननन्याई आधुनिक बौद्ध भी बोलते हैं उनके द्वारा स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे के सिद्धांत के आधार पर समाज सुधार का बीडा उठाया

 
                                        डाॅ0 आम्बेडकर का मानना था कि भारतीय समाज जो असंख्य जातियों, उपजातियों मे विभाजित, अंध विश्वासों और कट्टर पंथ में डूबा पिछडा समाज है जो लगातार आधुनिक दुनिया के बीच अमानवीय प्रथाओं में डूबा हुआ है इसलिए इन बुराओं को दूर किया जाना आवश्यक है
 
                                                      डाॅ0 आम्बेडकर का मानना था कि हिन्दू धर्म जन्म पर आधारित, जाति व्यवस्था की कमजोर चट्टान पर खडा है जहां पर जन्म के आधार पर व्यक्तियों के साथ अमानवीय भेद भाव किया जाता है उन्हें भोजन पानी, छूने नहीं दियाजाता सार्वजनिक स्थानो पर छुआछूत को मानते हुए उनके साथ सामाजिक, आथर््िाक व्यवहार नहीं किया जाता है ऐसे समाज में सबसे पहले उनके द्वारा महिलाओ को शिक्षा के प्रचार प्रसार पर जोर दिया गया था।


                                                डाॅ0 आम्बेडकर के द्वारा हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत करते हुए विभिन्न साम्प्रदाय, जातियों, समुदायो, और गोत्र में विभाजित हिन्दुओं, सिख, बौद्ध, जैन धर्म के सभी धर्मलाम्बावियों को एक करते हुए उन्हें हिन्दु मानते हुए हिन्दु शब्द की व्याख्या की उनका मानना था कि हिन्दु कोई धर्म नहीं वह पंथ है। वह धर्मो का समूह है जो विभिन्न जातियों, भाषा, वन के लोग, अपनाते हुए हिन्दुस्तान को एक करते हैं उनके अनुसार धर्म व्यक्तिगत, है
 
                                हिन्दू धर्म दर्शन के संबंध में डाॅ0 आम्बेडकर का यह मानना था कि वह तो समाज के लिए उपयोगी है और ही न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है वह पूरी तरह अपमान जनक और अमानवीय है इसलिए उन्होने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म सन् 1956 में स्वीकार किया था। डाॅ. आम्बेडकर का मानना था कि बौद्ध धर्म अंधविश्वास और आस्तिकता के खिलाफ लडना सिखाता है वह करूणा, प्यार बढाता है ।वह समता, समानता बतलाता है ।जब कि अन्य धर्म जो जीवन और मृत्यु के बाद आत्मा के चक्कर में पूरी जिन्दगी भटकते रहते हैं और मरने के बाद भी तंग रहते हैं जब कि बौद्ध धर्म में यह बुराई नहीं है इसलिए उन्होने बौद्ध धर्म अपनाया थां।

                                              डाॅ0 आम्बेडकर ने राजाराम मोहन राय, दयानंद सरस्वती, महात्मा ज्योती बा फुले जैसे सामाजिक सुधारको के साथ समाज सुधार की नींव रखी वे दलित उत्थानो और अछूतोधार आंदोलन के जनक माने गये वह बौद्धिक शिक्षाविद, विचारक मानवता के वकील थे उन्हेाने समाजिक पुनर्निमाण की नीव रखकर अनेक दूरदर्शी रचनात्मक यर्थाथ वादी सामाजिक सुधार किये थे इसलिए लोग उन्हें महान समाज सुधारक कहते थे।

                                         डाॅ0 आम्बेडकर के द्वारा सर्व प्रथम भरतीय महिलाओ को शिक्षित होने का संदेश देते हुए जाति, धर्म, भाषा, लिंग, स्थान के आधारपर व्याप्त सामाजिक, असामानता, शोषण भेदभाव, के विरूद्ध लडने के लिए एकजुट होने का संदेश दिया भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिक, कुरीतियों की तरफ समाज का ध्यान आकर्षित करनेक लिए 25 दिसम्बर 1927 को सार्वजनिक रूप से महिलाओ के साथ मिलकर मनुस्मृति को जलाकर महिलाओ में व्याप्त कुरीतियों, धार्मिक अंधविश्वासों, रूढियों प्रथाओं को समाप्त किये जाने की ज्वाला जलाई थी। उन्होने महिलाओ मंे सम्मान जनक जीवन जीने के लिए लडकियों को शिक्षित करने की बात कहीं थी उनका मानना था कि यदि स्त्री शिक्षित होगी तो उसका पूरा परिवार शिक्षित होगा

                                        डाॅ0 आम्बेडकर 19 और 20 मार्च 1927 को उन्होने दलित वर्ग की एक विशाल रैली में जिसमें महिलाएं भी शामिल थी। महिलाओ को यह संदेश दिया था कि पति को अपना दोस्त माने और दोस्त के अनुसार उसके साथ बराबर का व्यवहार करें उसके गुलाम होने से मना कर दें कम उम्र में शादी करे शादी होने के बाद ज्यादा बच्चे पैदा करें



                                       डाॅ0 आम्बेडकर के द्वारा 1928 में बम्बई विधान परिषद के सदस्य के रूप में सर्वप्रथम महिलाओ के लिए प्रसूति अवकाश मातृत्व लाभ, और निश्चित धनराशि की सहायता देने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रकार वे भारत में पहले व्यक्ति हे जिन्होंने महिलाओ के लिए प्रसव पूर्व अवधि के दौरान आराम हेतु कानून पारित करवाया था




                                  डाॅ0 आम्बेडकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनाये जा रहे संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष थे और स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री थे इस रूप मंे कार्य करते हुए उनके द्वारा महिला सशक्तिकरण कई वैधानिक कार्य किये गये उनके प्रयास से ही भारतीय संविधान में जाति, धर्म, भाषा, लिंग, के आधार पर व्याप्त असमानता और भेदभाव को समाप्त किया गया

 
                                  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया कि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म जाति लिंग, जन्म स्थान, के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार सभी को बराबरी के अवसर प्रदान किये जायेंगे स्त्रियों की दशा भारतीय समाज में दयनीय थी बाल विवाह, बहु विवाह, दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों की शिकार थीं और वे पूर्ण रूप से पुरूषों पर आश्रित थीं। उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। पुरूष की मर्जी ही उनकी मर्जी थी। इसी कारण राज्य को उनके लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार दिया गया।इसलिए संविधान के अनुच्छेद 15-3 में राज्य को स्त्रियों के हित और कल्याण के लिए विशेष उपबंध बनाये जाने हेतु अधिकार प्रदान किये गये
                                    यह माना गया कि अस्तित्व के संबंध में स्त्रियों की शारीरिक बनावट और उनके स्त्री जन्म में दुखद स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसलिये उनकी इनकी शारीरिक कुशलता का संरक्षण जनहित का उद्देश्य हो जाता। जिसके कारण उनकी शक्ति और निपुणता को सुरक्षित रखा जा सकता।

 
                        भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15-3 में राज्य स्त्रियों ओर बालकों के लिये विशेष प्रावधान कर सकता है अर्थात अनुच्छेद-15 के अपवाद स्वरूप लिंग के आधार पर विशेष उपबंध बनाकर विभेद कर सकता है
                          संविधान के अनुच्छेद-16 के अनुसार केवल लिंग के आधार पर नियोजन में भेद भाव नहीं किया जायेगा अर्थात अनुच्छेद-16 के अनुसार महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार दिये गये हैं
 
                      महिलाओं को शोषण के विरूद्व अधिकार दिया गया है अनुच्छेद 23 में मानव का व्यापार, बेगार ओर बलात्श्रम को दंडनीय अपराध बनाया गया है इसी प्रकार अनुच्छेद 23-2 के अंतर्गत सार्वजनिक प्रयोजनो के लिये अनिवार्य सेवा के लिये राज्य महिलाओं को बाध्य नहीं कर सकता
                                    संविधान के अनुच्छेद 29-2 के अनुसार राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से संचालित शिक्षा संस्थाओं में लिंग के आधार पर भेद भाव करते हुये महिलाओं के लिये अलग से स्कूल कालेज खोले जा सकते हैं
 
                              मूल अधिकारों के अलाबा महिलाओं को समाजिक,आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करने ,उनसे विचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जगाने प्रतिष्ठा ओर अवसर की समता प्राप्त करने उनकी गरिमा को बढ़ाने नीति निर्देशक तत्वों में राज्य को कल्यानकारी कार्यक्रम निर्देशित किया गया है
                          अनुच्छेद-39- में कहा गया है कि राज्य अपनी नीति इस प्रकार संचालित करेगा कि पुरूष और स्त्री सभी नागरिको को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो
 
                               अनुच्छेद 39-डी के अनुसार पुरूष और स्त्रियों को समान कार्य के लिये समान वेतन दिया जायेगा
                    अनुच्छेद 39- के अनुसार पुरूष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थय और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग हो और आर्थिक आवश्यक्ता से विवश होकर नागरिको को ऐसे रोजगारों में जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल हो।
 
                                   भारतीय संविधान के अनुच्छेद-42 के अनुसार स्त्री को विशेष प्रसूति अवकाश प्रदान किया जा सकता है। स्त्रियों के लिये राज्य प्रशिक्षण संस्था की स्थापना कर सकता है। अनुच्छेद 44 में सभी नागरिको के लिए समान नागरिक संहिता का प्रावधान रखा गया है भारत के प्रत्येक नागरिक पर यह कर्तव्य आरोपित किया गया है कि वह अनुच्छेद 51- - के अनुसार ऐसी प्रथाओं का त्याग करे ,जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्व है ,
                                        आज डाॅ0 आम्बेडकर के प्रयास से भारत के प्रत्येक नागरिक जिसमें स्त्रियाॅ शामिल है उन्हें राष्टृपति, उपराष्टृपति ,राज्यपाल,सांसद,विधायक,न्यायमूर्ति,न्यायधीश,आदि महत्वपूर्ण पदो पर नियुक्ति में कोई रोकटोक नहीं है अनुच्छेद-325 में निर्वाचक नामावली में लिंग के आधार पर भेद भाव करते हुये प्रत्येक चुनाव में वोट देने योग्य माना गया है इसी प्रकार पंचायत,नगर पालिका में जन भागीदारी में उनके 1/3 पद आरक्षित किये गये हें इसी प्रकार सबिधान में स़्ित्रयों संबंधित विशेष प्रावधान हे

                                    राज्य द्वारा अनुच्छेद 15-3 के अंतर्गत दिये विशेष प्रावधानों के अंतर्गत स्त्रियों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता प्रदान की गई है। उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है। महिलाओ को शोषण से बचाने के लिये विशेष कानून बनाये गये हैं। उनके अधिकारो की रक्षा के लिए राष्ट्र्ीय महिला आयोग की स्थापना की गई है।
                                          डाॅ0 आम्बेडकर के प्रयास से भारतीय समाज में महिलाओं की जन भागीधारी में भूमिका बढ़ाई गई है हमारे पुरूष प्रधान भारतीय समाज में महिलाओं को जन भागीदारी में भाग लेकर चुनाव में खड़े होने एवं ,जनता का प्रतिनिधित्व करने से हमेशा रोका गया है। यही कारण है कि देश की 50 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व करने के बाद भी 5 प्रतिशत महिलाऐं राज्य की विधान सभा और लोक सभा महिलाओं का नेतृत्व नहीं करती इस कारण संविधान में विशेष संशोधन किए गए हैं। संबिधान के 73 वें संशोधन अधिनियम के द्वारा संबिधान में भाग-9 पंचायत के संबंध में जोड़ा गया है। जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में ग्राम मध्यवर्तीय जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा जिसके अनुसार प्रतिनिधि निर्वाचन से चुने जाएगें
                               संविधान के अनुच्छेद 243-2 ,243-डी-2 के अनुसार आरक्षित स्थानों की कल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान अनुसुचित जाति या अनुसूचित जन जाति स्त्रियों के लिये आरक्षित रहेगें अनुच्छेद 243-डी-3 के अनुसार प्रत्येक पंचायत प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम 1/3 स्थान स्त्रियों के लिये आरक्षित रहगें इसी अनुच्छेद के अनुसार ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आंबटित किये जायेगें
                       इसी प्रकार अनुच्छेद 243-डी-4 के अनुसार पंचायतो में अध्यक्षों के पद स्त्रियों के लिये आरक्षित रहेगें, जिनकी संख्या कुल संख्या के 1/3 पद स्त्रियांे के लिये आरक्षित पदों की संख्या प्रत्येक स्तर पर भिन्न भिन्न पंचायतों को चक्रानुक्रम में आंबटित किये जायेगें
                               संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम के द्वारा भाग-9- जोड़कर प्रत्येक राज्य में जन संख्या के अनुसार नगर पालिका परिषद,नगर निगम ,नगर पंचायत,की स्थापना की गई है जिसके अनुच्छेद 243-टी-2 में आरक्षित स्थानों की कुल संख्या कर अनुसुचित जातियों या जन जातियों की स्त्रियों के लिये एक तिहाई स्थान आरक्षित किये गये हैं
 
                             इसी प्रकार 243-टी-3 के अनुसार भरे जाने वाले स्थानो की कुल संख्या की 1/3 स्थान स्त्रियों के लिये आरक्षित रहेगंे जिसमें अनुसूचित जाति या जनजातियों की स्त्रियों के आरक्षित स्थान शामिल हैं। ऐसे स्थान किसी नगर पालिका के भिन्न भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आंबटित किये जायेगें 243-टी-4 नगरपालिका में अध्यक्षो के पद अनुसूचित जातियों या जनजातियों की स़्ित्रयों के लिये आरक्षित रहेगें जिसे राज्य विधान मंडल विधि द्वारा निर्धारित करेगा
 
                              संविधान के 97 वें संशोधन के द्वारा भाग-9- जोड़कर सहकारी समितियाॅ स्थापित की गई है प्रत्येक राज्य में आर्थिक भागीदारी और स्वायत्त कार्य संपादन के आधार पर सहकारी समितियों की स्थापना की गई है जो सहकारी समितियों से संबंधित विधि के आधीन रजिस्ट्ीकृत है सहकारी समिति प्रबंधक नियंत्रण का कार्य सहकारी समिति बोर्ड को सोंपा गया है अनुच्छेद 243-जेड.जे.-एक के अनुसार 21 निर्देशक होगें जिसमें महिलाओं के लिये दो स्थान आरक्षित रहेगें
 
                           भारत में एक लम्बी अवधि से लोकसभा ओर राज्य की विधानसभा में स्त्रियों के 1/3 आरक्षण को लेकर वाद विवाद चल रहा है और सर्वसम्मति से इस बिल को पास होने नहीं दिया जा रहा है जवकि संविधान के अनुच्छेद-15-3 के अनुसार स्त्रियों को 1/3 आरक्षण प्रदान किया जा सकता है ।लेकिन गांब पंचायत, जिला स्तर पर महिलाओं की जन भागीदारी स्वीकार की गई है लेकिन अब राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी स्वीकार किये जाने में अनिइच्छा व्यक्त की जा रही है जो हमारी पुरातनी सोच का प्रतीक है जिसे बदले जाने की आवश्यकता है
 
                                        डाॅ0आम्बेडकर के द्वारा हिन्दू महिलाओ को पुरूषो के बराबर अधिकार दिये गये हैं। उन्हें विवाह, तलाक, दत्तक का अधिकार प्रदान किये जाने हेतु सन् 1991 हिन्दू कोडबिल पहले न्यायमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जिसका हिन्दूवादी ताकतो मंे उसे हिन्दू विरोधी बताकर घोर विरोध किया है डाॅ0 आम्बेडकर को आधुनिकमनु के नाम से बदनामीयत कर हिन्दू संस्कृति के ढांचे के रूप में विपरीत माना गया जिसके कारण हिन्दू कोडबिल संसद में पारित नहीं हो सका और जिसके विरोध में 27 सितम्बर 1951 को डाॅ0 आम्बेडकर के द्वारा मंत्री मडल से स्तिफा देकर महिलाओ के उत्थान के लिए सर्वोच्च बलिदान एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया है
 
                                        हिन्दू कोडबिल ने जीवन के सभी क्षेत्रो में महिलाओ के लिए समानता नीवं रखी थी। महिलाओ को बच्चे का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार दिया गया था। उसे भरण पोषण प्रतिकर प्रदान किया गया था। विधवा उत्तराधिकार में पैत्रिक सम्पत्ति प्राप्त कर सकती थी। बच्चे को गोद ले सकती थी निर्वसीयत सम्पत्ति पर अपना हक जता सकती थी। लेकिन डाॅ0 आम्बेडकर के महिला सुधार और सशक्तिकरण के प्रयासो को महिला विरोधी ज्यादा दिन तक रोक नहीं पाये और बाद में हिन्दू कोड बिल 4 खण्ड में निम्नलिखित रूपो में पारित किया गया है-

1. हिन्दू विवाह अधिनियम 1955,
2. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956,
3. हिन्दू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम 1956,
4. गोद लेने और रखरखव अधिनियम 1956,
                                हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 के अंतर्गत बाद में संशोधन किये गये है और महिला उसके पिता की पैत्रिक सम्पत्ति में पुरूषो के बराबर हक अधिकार उत्तराधिकार के रूप मेंप्रदान किया गया है जो आम्बेडकर के द्वारा महिला उत्थान के लिए जलाई गई अलख की रोश्नी का एक भाग है
 
                                                    डाॅ0 आम्बेडकर को महिला अधिकारो के चैपियन माना जाता था। उनका मानना था कि शिक्षा शिक्षित महिलाओ के बिना निरर्थक है और आंदोलन महिलाओ की ताकत के बिना अधूरा है इसलिए उनके द्वारा महिलाओ को जन आंदोलन मे शामिल किया गया था। उनका आधारभूत सिद्धांत था कि भगवान जन्म  जाति या स्थान से आदमी या औरत को नहीं पहचानता है तो आदमी रूढिवादी और अंधविश्वासी धर्मो/ऐसा नहीं होना चाहिए नहीं कर सकते हैं बना दिया है
 
                              आम्बेडकर साबित कर दिया है खुद को एक प्रतिभाशाली होने के लिए ओर एक महान विचारक, दार्शनिक, क्रांतिकारी, विधिवेत्ता, खासकर विपुल लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और आलोचक के रूप में जाना जाता है और उनकी मृतयु पर्यत भारतीय दृश्य में एक बादशाह की तरह खडे रहे था। अपने विचारो को कभी नही वह एक अछूत के रूप में पैदा हुआ था, सिर्फ इसलिए कि भारतीय समाज की व्यापकता में पर्याप्त ध्यान दिया गया