गुरुवार, 30 जनवरी 2014

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध...................उत्तरदायी कौन ?

nari
  
                                                      महिलाओं के प्रति बढ़ते  अपराध...................उत्तरदायी कौन ?

    हम 20 वीं सदी के भारत से आज आधुनिक इक्कसवीं सदी के भारत में प्रवेश कर गये हैं, जहाॅ पर महिलाएॅ घर की चाहरदीवारी में न रहकर पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है और देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं।   

      आज आपको जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं दिखता जहाॅ पर महिलायें नजर न आये। देश और समाज की रक्षा करने में भी बराबर का योगदान और सेवा-पुलिस और सेना में भर्ती होकर दे रही हैं। परन्तु इन सबके बावजूद भी आज नारी को सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं हुआ है और उसे अनेक सामाजिक, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तथा उसके विरूद्ध समाज में अपराध, दहेज, बलात्कार, हत्या जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इन अपराधों में दिन ब दिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। 

        हम जिस गति से सामाजिक आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं, उतनी ही गति से हमारे समाज में महिलाओं के प्रति अपराधों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। देश में प्रतिवर्ष महिलाओं के प्रति अपराधों के अंाकड़े प्रकाशित होते हैं और उनसे स्पष्ट होता है, कि अपराध, बलात्कार, हत्या, दहेज एवं भ्रूण हत्या आदि मामले तेजी से बढ़ रहे हैं तथा इक्कीसवीं सदी में इनकी गति में कमी आने की गुंजाईश प्रतीत नहीं होती है। 

        हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी पूर्व की तरह ज्यों का त्यों है। आज भी हम अपने पुराने परम्परागत कुरीतियों, रूढि़यो, प्रथाओं, परम्पराओं से बाहर नहीं हो पाये हैं और महिलाओं का पैदा होना ही एक अभिशाप मानते हैं। 


        आज कितने माॅ-बाप हैं जो लड़की पैदा होने पर मिठाई बांटते हैं और लड़के की तरह खुशी मनाते हैं और यही कारण है, कि महिलाओं के प्रति समाज में अपराध निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। 


        अब तो गर्भ में ही परीक्षण कराकर लड़की की हत्या कर दी जाती है और उसे पैदा होने ही नहीं दिया जता है। यदि लड़की पैदा हो गई तो उसे लड़कों की तरह उच्च शिक्षा नहीं दिलाई जाती है और यदि लड़की पढ़-लिख गई तो उसकी मर्जी के बिना उसकी शादी-ब्याह कर दिया जाता है और शादी ब्याह में उसके परिवार वालों की हैसियत से ज्यादा दहेज की मांग की जाती है और दहेज दिये जाने के बाद भी यदि ससुराल वाले खुश नहीं हुए तो जलाकर मार डाला जाता है या इतना सताया जाता है, कि वह खुद आत्महत्या करने के लिये मजबूर हो जाती है।


        आज दहेज अपराध समाज में तेजी से बढ़ रहा है और इससे न केवल मध्यम वर्गीय बल्कि समाज का पढ़ा-लिखा उच्च वर्ग भी प्रभावित है और आई.एस. और आई.पी.एस. जैसे उच्च पद पर पदस्थ लोगों के समाज में पचास लाख, एक करोड़ शादी के रेट हैं। जो बाजार में बिकते सामानों की तरह फिक्स है। इसी से आज समाज में व्याप्त खोखलेपन का अन्दाज लगा सकते हैं। 


        आज भी हमारे समाज में बाल विवाह, सती प्रथा, बहुविवाह, देवदासी प्रथा, बेड़नी, प्रथा, वैश्यावृत्ति जैसी बुराईंया विद्यमान हैं और खुले आम हजारों की संख्या में एक साथ विवाह बाल विवाह होते हैं। धर्म की आड़ में एक पत्नि के रहते हुए दूसरी शादी कर ली जाती है और खुले आम लड़की को स्वर्ग पहुंचाने के उद्देश्य से पति की चिता में जला दिया जाता है। कुछ जातियों में लड़कियों को पैदा होते ही बचपन से वैश्यावृत्ति में लगा दिया जाता है और कुछ जगहों तो लड़कियों को भगवान को समर्पित करके देवदासी प्रथा के रूप में जीवन गुंजारने मजबूर किया जाता है। 

        हम आजादी के 60-65 साल बाद भी कुछ सामाजिक परिवर्तन नहीं कर पाये हैं और महिलाओं के प्रति हमारे नजरिये में कोई परिवर्तन नहीं आया है। हम इक्कीसवीं सदी में भी पहुंच गये हैं लेकिन आज भी हमारे समाज में सैकड़ों सालों से चली आ रही बुराईंया विद्यमान हैं। द्वापद युग की तरह चीर हरण किया जाता है, त्रेता युग की तरह उसकी अग्नि परीक्षा ली जाती है और अहिल्या की तरह उसे शिला बनना पड़ता है। 


        शासन ने महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिये कड़े कानून अवश्य बनाये हैं। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम जिनमें महत्वपूर्ण बाल विवाह अवरोध अधिनियम, महिलाओं का अश्लील निरूपण प्रतिषेध अधिनियम, सती निवारण अधिनियम जिनमें महत्वपूर्ण है।


        महिलाओं के प्रति प्रत्येक बुराई को अपराध की श्रेणी में माना है और हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, दहेज की मांग, कू्ररता, छेड़छाड़, अश्लील विज्ञापन, भू्रण हत्या, गर्भपात आदि अपराधों में कठोर दंड का प्रावधान है।


         हमारे समाज में शिक्षा की कमी, अधिकारों के प्रति जागरूकता न होने के कारण इन कानूनों को महिलाएॅ लाभ प्राप्त नहीं कर पाती हैं और अपराध सहती रहती है। इसके लिये आवश्यक है, कि वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहे और प्रत्येक बुराई का तीव्रता से विरोध कर प्रचलित संस्थाआंे मानव अधिकार आयोग, विधिक सेवा प्राधिकरण आदि का सहारा लेने का तेजी से उसका दमन करें।


        आज समाज में महिलाओं को जागृत करने राष्ट्रीय महिला आयोग, मानव अधिकार आयोग की रचना की गई है, जिनका कार्य महिलाओं के लिये प्राप्त कानून में प्राप्त रक्षा उपायों का क्रियान्वयन कराना, महिलाओं की दशा सुधारने का कार्य करना, महिलाओं को संरक्षण प्रदान करना, मार्गदर्शक सिद्धांत बनाना तथा   महिलाओं के विरूद्ध विभेद और अत्याचारों से उत्पन्न विशिष्ट समस्याओं का अध्ययन कर उन्हें दूर करना होगा तथा महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक विकास की योजना बनाना इन सब घटकों के माध्यम से महिलाओं के विकास में बाधक तत्वों को दूर किया जा सकता है और महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराकर उन्हें जागृत कर उनके विरूद्ध बढ़ रहे सामाजिक अपराधों को कम किया जा सकता है।

        मानव अधिकार आयोग के गठन से देश में महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों और उनके प्रति होते अपराधों का विरोध करने पर अपराधों की संख्या में कमी आई है। यदि किसी संस्था, संगठन, सरकारी संस्था द्वारा महिलाओं के प्रति अपराध किया जाता है या महिला होने के कारण उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी जाती है। उनके प्रति अत्याचार किया जाता है, तो इस संबंध में राज्य मानव अधिकार की सहायता ली जा सकती है। उसे सूचना दिये जाने पर अविलंब कार्यवाही की जा सकती है।

        प्रत्येक जिले में माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश को मानव अधिकार हनन के मामलों की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है। जहाॅ पर शिकायतें भेजकर परिवाद दायर कर सहायता ली जा सकती है। मानव अधिकार आयोग ने अपनी कार्य प्रणाली के कारण समाज में गहरा स्थान बना लिया है और दिन-प्रतिदिन उसका महत्व बढ़ता जा रहा है।



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