शनिवार, 7 सितंबर 2013

महिला एंव बच्चो से संबधित कानून के क्र्रियान्वयन में आने वाली कठिनाई


महिला एंव बच्चो से संबधित कानून के क्र्रियान्वयन में आने वाली कठिनाई

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3)के अनुसार महिला एंव बच्चो के संबंध में विशेष उपबंध दिये जाने दिशा निर्देश के अंतर्गत कई कानून बनाये गये है। जिनमें महत्वपूर्ण घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005, दहेज प्रतिशेध अधिनियम 1961, माता और पिता वरिष्ठ नागरिको का भरण-पोषण एंव कल्याण अधिनियम, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006,अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956, अल्पवय व्यक्ति अपहानिकर प्रकाशन अधिनियम 1956, किशोर न्याय अधिनियम 2000, स्त्री अशिष्ट रूपण प्रतिषेध अधिनियम 1986, बालक श्रम प्रतिषेध अधिनियम 1986 आदि अधिनियम प्रचलित है


जिनमें वर्तमान में बनाया गया कानून लैंगिक अपराधों से बालको का संरक्षण अधिनियम 2012 महत्वपूर्ण है जिसमें महिला एंव बच्चों संबंधी प्रत्येक लैंगिक अपराध को दंडनीय बनाया गया है

 
इस अधिनियम के अंतर्गत अश्लील साहित्य जो इलेक्ट्रोनिक तकनीक से कम्प्यूटर से तैयार किया गया है जिसमें अश्लील फिल्म भी शामिल है उसको भी अपराध माना गया है लेकिन यह देखा गया है कि विवेचना के दौरान विवेचक भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-1-बी के अनुसार अन्वेषण अधिकारी के द्वारा साक्ष्य एकत्रित नहीं की जाती है

लैंगिक अपराधों से बालको का संरक्षण अधिनियम की धारा-19 के अंतर्गत विशेष किशोर पुलिस यूनिट की स्थापना प्रत्येक जिले में नहीं की है। जहंा पर बालक के द्वारा धारा 19 के अंतर्गत अपराध की सूचना पुस्तिका में दर्ज की जावेगी

 
इसी अधिनियम की धारा-24 के अंतर्गत बालक का कथन दर्ज नहीं किये जा रहे हैं, पुलिस अधिकारी बर्दी में रहकर कार्यवाही करते हैं जो धारा-24 के प्रावधानो के विपरीत है
अधिनियम की धारा 24 में बालक के कथन को अभिलिखित करने

अधिनियम की धारा 26 में बालक के कथन अभिलिखित किये जाने के संबंध में अतिरिक्त उपबंध किये गये हैं जो निम्नलिखित है:-
अधिनियम की धारा-25-1 के परन्तु के अनुसार होगा अर्थात अभियुक्त के अधिवक्ता की उपस्थिति में कथन अभिलिखित नहीं किया जावेगा धारा 164-1 दं0प्र0सं0 ऐसे मामलो में लागू नहीं होगी
 
अधिनियम की धारा-25-2 में विशेष प्रावधान दिये गये हैं जिस प्रकार अभियोग पत्र की नकल चालान पेश होने पर आरोपी को धारा 207 दं0प्र0सं0 के अंतर्गत प्रदान की जाती है। उसी प्रकार पीडित बालक और उसके अभिभावक या उसके प्रतिनिधि को चालान की नकल अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत होने पर प्रदान करेगा
 
अधिनियम के अनुसार बालक और उसके अभिभावक या उसके प्रतिनिधि को संहिता की धारा 207 के अधीन विनिर्दिष्ट दस्तावेजो की प्रति पुलिस द्वारा अंतिम प्रतिवेदन धारा 173 दं0प्र0सं0 के अंतर्गत फाईल किये जाने पर मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदान की जावेगी
 
अधिनियम में यह विशेष प्रावधान किया गया है कि चालान पेश होते ही बालक को चालान की नकल दी जावे। इसके लिये आवश्यक है कि जैसे ही चालान पेश होता है इसकी सूचना बालक और उसके अभिभावक को न्यायालय के माध्यम से दी जावे और बालक और उसके अभिभावक के न्यायालय में उपस्थित होने पर चालान की नकल धारा 207 दं0प्र0सं0के अतंर्गत दी जावेगी
 
विशेष न्यायालय गठित होने के बाद अधिनियम की धारा 33 के अंर्तगत सी0जे0एम0 के यहां चालान पेश किया जा रहा है। जब कि बिना कमिटल कार्यवाही के सीधे विशेष न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया जाना चाहिये। इस प्रावधान का अभियोजन और न्यायालय दोनो के द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है
अधिनियम के अंतर्गत चालान पेश किये जाने के प्रार्थी बालक की उस समय आयु क्या थी की जांच अभियोजन के द्वारा नहीं की जा रही है जब कि यह साबित किया जाना आवश्यक है कि प्रार्थी 18 या 18 वर्ष से कम उम्र की महिला या बालक है
 
बालक को अधिनियम की धारा 40 के अंतर्गत विधिक सहायता थाने से उपलब्ध कराया जाना चाहिये जो उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। अतः रिपोर्ट होते ही विवेचना अधिकारी का कर्तव्य है कि वह उसे इस अधिकार से अवगत करावें
 
महिला एंव बच्चों के संबंध में दंड विधि संशोधन अधिनियम तीन फरवरी 2013 से प्रभावशील है जिसके द्वारा दं0प्र0सं0 की धारा 54- में संशोधन किया गया है कि शारीरिक और मानसिंक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की शिनाख्त न्या0दंडा0 के निर्देशन में होना एंव जिसकी वीडियों फिल्म तैयार की जाना इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है जिसका पालन नहीं किया जा रहा है

 
इसी प्रकार धारा 154 के अंतर्गत लैंिगक अपराध से संबंधित रिपोर्ट किये जाने पर रिपोर्ट अभिलिखित अधिकारी के द्वारा रिपोर्ट दर्ज की जाने के तत्काल बाद बालक को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाना चाहिये रिपोर्ट महिला के संबंध मंे कराई जाती है तो उसका महिला चिकित्सक के द्वारा परीक्षण किया जावेगा तथा उसका कथन न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष अभिलिखित कराया जावेगा जिसका पालन नहीं किया जा रहा है

 
दंड विधि संशोधन अधिनियम 2013 के अंतर्गत अश्लील अपराधों के संबंध में धारा-197 दं0प्र0सं0 के अतंर्गत पूर्व मंजूरी लोक सेवक के विरूद्ध आवश्यक नहीं है दं0प्र0सं0 की धारा 309 के अंतर्गत दो माह के अंदर आरोप पत्र दाखिल किया जाना आवश्यक है। इसके लिये जरूरी है कि विवेचना अधिकारी साक्षियों को अपनी जिम्मेदारी पर न्यायालय में उपस्थित रखे अतः इस संबंध में दिशा निर्देश जारी किया जाना आवश्यक है
 
इसके अलावा दं0प्र0सं0 संशोधन अधिनियम 2008 के प्रावधानो का भी पालन महिला एंव बच्चों से संबंधित अपराधों में नहीं किया जा रहा है ।ं धारा 54 के अंतर्गत महिला का चिकित्सीय परीक्षण महिला डाक्टर के द्वारा नहीं किया जाता है धारा 197-1 के अनुसार पीडि़त का कथन उसके निकट रिश्तेदारों की मौजूदगी में अभिलिखित नहीं किया जाता है तथा इलेक्ट्रानिक माध्यमो का उपयोग नहीं किया जा रहा है।

 
यदि डी0एन0आर0 टेस्ट कराया जावे तो ऐसे मामलों में दोषसिद्धि की पूर्ण संभावना रहेगी। लेकिन खर्च के कारण डी0एन0आर0 टेस्ट नहीं कराया जा रहा है अधिनियम की धारा 172-1 - के अंतर्गत केस डायरी सजिल्द नहीं बनाई जा रही है ही अधिनियम की धारा 41 के अंतर्गत गिरफतारी के संशोधित प्रावधानो का पालन किया जा रहा है
अधिनियम की धारा 357- पीडि़ता को अभियोजन के द्वारा चिकित्सीय सहायता बिना खर्च के उपलव्ध नही कराई जा रही है जिसके कारण पीडि़ता अपना इलाज कराने में असमर्थ है
इसके अलावा बालक से संबंधित अपराध में जिसमें बाल अपराधी हो तो उन्हें जानबूझकर 18 वर्ष से अधिक की आयु का बताकर व्यसको के साथ गम्भीर अपराधो में जेल भेज दिया जाता है जहां पर उनको अधिक समय तक बड़े अपराधियों के साथ गंभीर अपराधो में जेल में बंद रखा जाता है तो वहां पर वह बुरी संगत में पड़ते हैं इसके लिये जरूरी है कि बाल अपराधियों की जांच की जावे यदि विवेचना अधिकारी पाते हैं कि अपराध बालक के द्वारा किया गया है तो उसे किशोर न्याय बोर्ड से समक्ष उपस्थित रखा जावे
लापता बच्चो के सबंध में मामले उच्चतम न्यायालय के द्वारा जारी दिशा निर्देश की लापता बच्चो के सबंध में तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज होना चाहिए और विशेष पुलिस इकाई की स्थापना की जानी चाहिए। जिसका गम्भीरता से पालन नहीं किया जा रहा है
 
अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956 के अंतर्गत विशेष पुलिस अधिकारी और सलाहकार की नियुक्ति ऐसे क्षेत्र में नहीं की जाती है घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अपराध की सूचना के बाद भी पुलिस अधिकारी के द्वारा अधिनियमो के प्रावधानों के अंतर्गत कार्यवाही नहीं की जाती है।
उमेश कुमार गुप्ता











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