महिला
एंव
बच्चो
से
संबधित
कानून
के
क्र्रियान्वयन
में
आने
वाली
कठिनाई
भारतीय
संविधान
के
अनुच्छेद
15(3)के
अनुसार
महिला
एंव
बच्चो
के
संबंध
में
विशेष
उपबंध
दिये
जाने
दिशा
निर्देश
के
अंतर्गत
कई
कानून
बनाये
गये
है।
जिनमें
महत्वपूर्ण
घरेलू
हिंसा
से
महिला
संरक्षण
अधिनियम
2005,
दहेज
प्रतिशेध
अधिनियम
1961,
माता
और
पिता
वरिष्ठ
नागरिको
का
भरण-पोषण
एंव
कल्याण
अधिनियम,
बाल
विवाह
प्रतिषेध
अधिनियम
2006,अनैतिक
व्यापार
निवारण
अधिनियम
1956,
अल्पवय
व्यक्ति
अपहानिकर
प्रकाशन
अधिनियम
1956,
किशोर
न्याय
अधिनियम
2000,
स्त्री
अशिष्ट
रूपण
प्रतिषेध
अधिनियम
1986,
बालक
श्रम
प्रतिषेध
अधिनियम
1986
आदि
अधिनियम
प्रचलित
है
।
जिनमें
वर्तमान
में
बनाया
गया
कानून
लैंगिक
अपराधों
से
बालको
का
संरक्षण
अधिनियम
2012
महत्वपूर्ण
है
जिसमें
महिला
एंव
बच्चों
संबंधी
प्रत्येक
लैंगिक
अपराध
को
दंडनीय
बनाया
गया
है
।
इस
अधिनियम
के
अंतर्गत
अश्लील
साहित्य
जो
इलेक्ट्रोनिक
तकनीक
से
कम्प्यूटर
से
तैयार
किया
गया
है
जिसमें
अश्लील
फिल्म
भी
शामिल
है
उसको
भी
अपराध
माना
गया
है
।
लेकिन
यह
देखा
गया
है
कि
विवेचना
के
दौरान
विवेचक
भारतीय
साक्ष्य
अधिनियम
की
धारा
65-1-बी
के
अनुसार
अन्वेषण
अधिकारी
के
द्वारा
साक्ष्य
एकत्रित
नहीं
की
जाती
है
।
लैंगिक
अपराधों
से
बालको
का
संरक्षण
अधिनियम
की
धारा-19
के
अंतर्गत
विशेष
किशोर
पुलिस
यूनिट
की
स्थापना
प्रत्येक
जिले
में
नहीं
की
है।
जहंा
पर
बालक
के
द्वारा
धारा
19
के
अंतर्गत
अपराध
की
सूचना
पुस्तिका
में
दर्ज
की
जावेगी
।
इसी
अधिनियम
की
धारा-24
के
अंतर्गत
बालक
का
कथन
दर्ज
नहीं
किये
जा
रहे
हैं,
पुलिस
अधिकारी
बर्दी
में
रहकर
कार्यवाही
करते
हैं
जो
धारा-24
के
प्रावधानो
के
विपरीत
है
।
अधिनियम
की
धारा
24
में
बालक
के
कथन
को
अभिलिखित
करने
अधिनियम
की
धारा
26
में
बालक
के
कथन
अभिलिखित
किये
जाने
के
संबंध
में
अतिरिक्त
उपबंध
किये
गये
हैं
जो
निम्नलिखित
है:-
अधिनियम
की
धारा-25-1
के
परन्तु
के
अनुसार
होगा
।
अर्थात
अभियुक्त
के
अधिवक्ता
की
उपस्थिति
में
कथन
अभिलिखित
नहीं
किया
जावेगा
।
धारा
164-1
दं0प्र0सं0
ऐसे
मामलो
में
लागू
नहीं
होगी
।
अधिनियम
की
धारा-25-2
में
विशेष
प्रावधान
दिये
गये
हैं
।
जिस
प्रकार
अभियोग
पत्र
की
नकल
चालान
पेश
होने
पर
आरोपी
को
धारा
207
दं0प्र0सं0
के
अंतर्गत
प्रदान
की
जाती
है।
उसी
प्रकार
पीडित
बालक
और
उसके
अभिभावक
या
उसके
प्रतिनिधि
को
चालान
की
नकल
अंतिम
रिपोर्ट
प्रस्तुत
होने
पर
प्रदान
करेगा
।
अधिनियम
के
अनुसार
बालक
और
उसके
अभिभावक
या
उसके
प्रतिनिधि
को
संहिता
की
धारा
207
के
अधीन
विनिर्दिष्ट
दस्तावेजो
की
प्रति
पुलिस
द्वारा
अंतिम
प्रतिवेदन
धारा
173
दं0प्र0सं0
के
अंतर्गत
फाईल
किये
जाने
पर
मजिस्ट्रेट
द्वारा
प्रदान
की
जावेगी
।
अधिनियम
में
यह
विशेष
प्रावधान
किया
गया
है
कि
चालान
पेश
होते
ही
बालक
को
चालान
की
नकल
दी
जावे।
इसके
लिये
आवश्यक
है
कि
जैसे
ही
चालान
पेश
होता
है
इसकी
सूचना
बालक
और
उसके
अभिभावक
को
न्यायालय
के
माध्यम
से
दी
जावे
और
बालक
और
उसके
अभिभावक
के
न्यायालय
में
उपस्थित
होने
पर
चालान
की
नकल
धारा
207
दं0प्र0सं0के
अतंर्गत
दी
जावेगी
।
विशेष
न्यायालय
गठित
होने
के
बाद
अधिनियम
की
धारा
33
के
अंर्तगत
सी0जे0एम0
के
यहां
चालान
पेश
किया
जा
रहा
है।
जब
कि
बिना
कमिटल
कार्यवाही
के
सीधे
विशेष
न्यायालय
में
चालान
प्रस्तुत
किया
जाना
चाहिये।
इस
प्रावधान
का
अभियोजन
और
न्यायालय
दोनो
के
द्वारा
पालन
नहीं
किया
जा
रहा
है
।
अधिनियम
के
अंतर्गत
चालान
पेश
किये
जाने
के
प्रार्थी
बालक
की
उस
समय
आयु
क्या
थी
की
जांच
अभियोजन
के
द्वारा
नहीं
की
जा
रही
है
।
जब
कि
यह
साबित
किया
जाना
आवश्यक
है
कि
प्रार्थी
18
या
18
वर्ष
से
कम
उम्र
की
महिला
या
बालक
है
।
बालक
को
अधिनियम
की
धारा
40
के
अंतर्गत
विधिक
सहायता
थाने
से
उपलब्ध
कराया
जाना
चाहिये
जो
उपलब्ध
नहीं
कराई
जा
रही
है।
अतः
रिपोर्ट
होते
ही
विवेचना
अधिकारी
का
कर्तव्य
है
कि
वह
उसे
इस
अधिकार
से
अवगत
करावें
।
महिला
एंव
बच्चों
के
संबंध
में
दंड
विधि
संशोधन
अधिनियम
तीन
फरवरी
2013
से
प्रभावशील
है
।
जिसके
द्वारा
दं0प्र0सं0
की
धारा
54-क
में
संशोधन
किया
गया
है
कि
शारीरिक
और
मानसिंक
रूप
से
अस्वस्थ
व्यक्ति
की
शिनाख्त
न्या0दंडा0
के
निर्देशन
में
होना
एंव
जिसकी
वीडियों
फिल्म
तैयार
की
जाना
इस
बात
का
ध्यान
रखा
जाना
आवश्यक
है
।
जिसका
पालन
नहीं
किया
जा
रहा
है
।
इसी
प्रकार
धारा
154
के
अंतर्गत
लैंिगक
अपराध
से
संबंधित
रिपोर्ट
किये
जाने
पर
रिपोर्ट
अभिलिखित
अधिकारी
के
द्वारा
रिपोर्ट
दर्ज
की
जाने
के
तत्काल
बाद
बालक
को
चिकित्सा
सहायता
उपलब्ध
कराई
जाना
चाहिये
।
रिपोर्ट
महिला
के
संबंध
मंे
कराई
जाती
है
तो
उसका
महिला
चिकित्सक
के
द्वारा
परीक्षण
किया
जावेगा
तथा
उसका
कथन
न्यायिक
दंडाधिकारी
के
समक्ष
अभिलिखित
कराया
जावेगा
जिसका
पालन
नहीं
किया
जा
रहा
है
।
दंड
विधि
संशोधन
अधिनियम
2013
के
अंतर्गत
अश्लील
अपराधों
के
संबंध
में
धारा-197
दं0प्र0सं0
के
अतंर्गत
पूर्व
मंजूरी
लोक
सेवक
के
विरूद्ध
आवश्यक
नहीं
है
।
दं0प्र0सं0
की
धारा
309
के
अंतर्गत
दो
माह
के
अंदर
आरोप
पत्र
दाखिल
किया
जाना
आवश्यक
है।
इसके
लिये
जरूरी
है
कि
विवेचना
अधिकारी
साक्षियों
को
अपनी
जिम्मेदारी
पर
न्यायालय
में
उपस्थित
रखे
।
अतः
इस
संबंध
में
दिशा
निर्देश
जारी
किया
जाना
आवश्यक
है
।
इसके
अलावा
दं0प्र0सं0
संशोधन
अधिनियम
2008
के
प्रावधानो
का
भी
पालन
महिला
एंव
बच्चों
से
संबंधित
अपराधों
में
नहीं
किया
जा
रहा
है
।ं
धारा
54
के
अंतर्गत
महिला
का
चिकित्सीय
परीक्षण
महिला
डाक्टर
के
द्वारा
नहीं
किया
जाता
है
।
धारा
197-1
के
अनुसार
पीडि़त
का
कथन
उसके
निकट
रिश्तेदारों
की
मौजूदगी
में
अभिलिखित
नहीं
किया
जाता
है
तथा
इलेक्ट्रानिक
माध्यमो
का
उपयोग
नहीं
किया
जा
रहा
है।
यदि
डी0एन0आर0
टेस्ट
कराया
जावे
तो
ऐसे
मामलों
में
दोषसिद्धि
की
पूर्ण
संभावना
रहेगी।
लेकिन
खर्च
के
कारण
डी0एन0आर0
टेस्ट
नहीं
कराया
जा
रहा
है
।
अधिनियम
की
धारा
172-1
-ख
के
अंतर्गत
केस
डायरी
सजिल्द
नहीं
बनाई
जा
रही
है
न
ही
अधिनियम
की
धारा
41
के
अंतर्गत
गिरफतारी
के
संशोधित
प्रावधानो
का
पालन
किया
जा
रहा
है
।
अधिनियम
की
धारा
357-क
पीडि़ता
को
अभियोजन
के
द्वारा
चिकित्सीय
सहायता
बिना
खर्च
के
उपलव्ध
नही
कराई
जा
रही
है
जिसके
कारण
पीडि़ता
अपना
इलाज
कराने
में
असमर्थ
है
।
इसके
अलावा
बालक
से
संबंधित
अपराध
में
जिसमें
बाल
अपराधी
हो
तो
उन्हें
जानबूझकर
18
वर्ष
से
अधिक
की
आयु
का
बताकर
व्यसको
के
साथ
गम्भीर
अपराधो
में
जेल
भेज
दिया
जाता
है
।
जहां
पर
उनको
अधिक
समय
तक
बड़े
अपराधियों
के
साथ
गंभीर
अपराधो
में
जेल
में
बंद
रखा
जाता
है
तो
वहां
पर
वह
बुरी
संगत
में
पड़ते
हैं
।
इसके
लिये
जरूरी
है
कि
बाल
अपराधियों
की
जांच
की
जावे
यदि
विवेचना
अधिकारी
पाते
हैं
कि
अपराध
बालक
के
द्वारा
किया
गया
है
तो
उसे
किशोर
न्याय
बोर्ड
से
समक्ष
उपस्थित
रखा
जावे
।
लापता
बच्चो
के
सबंध
में
मामले
उच्चतम
न्यायालय
के
द्वारा
जारी
दिशा
निर्देश
की
लापता
बच्चो
के
सबंध
में
तत्काल
एफ0आई0आर0
दर्ज
होना
चाहिए
और
विशेष
पुलिस
इकाई
की
स्थापना
की
जानी
चाहिए।
जिसका
गम्भीरता
से
पालन
नहीं
किया
जा
रहा
है
।
अनैतिक
व्यापार
अधिनियम
1956
के
अंतर्गत
विशेष
पुलिस
अधिकारी
और
सलाहकार
की
नियुक्ति
ऐसे
क्षेत्र
में
नहीं
की
जाती
है
।
घरेलू
हिंसा
से
महिला
संरक्षण
अधिनियम
के
अंतर्गत
अपराध
की
सूचना
के
बाद
भी
पुलिस
अधिकारी
के
द्वारा
अधिनियमो
के
प्रावधानों
के
अंतर्गत
कार्यवाही
नहीं
की
जाती
है।
उमेश
कुमार गुप्ता
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