बाबा
आम्बेडकर
एक
समाज
सुधारक
बाबा
आम्बेडकर
एक
महान्
समाज
सुधारक
एवं
भारतीय
नारी
के
उत्थारक
थे।
उनका
मानना
था
कि
स्त्रियों
की
उन्नति
या
अवनति
पर
ही
राष्ट््र
की
उन्नति
निर्मित
करती
है।
डाॅ.
आम्बेडकर
के
द्वारा
भारतीय
नारी
को
पुरुषो
के
समान
अधिक
से
अधिक
अधिकार
और
समानता
प्रदान
किए
जाने
का
प्रयास
किया
गया
था।
उन्होंने
देश
के
प्रथम
विधि
मंत्री
के
रूप
में
हिन्दू
कोट
बिल
प्रस्तुत
किया
था।
महिला-पुरूष
एकता
की
अलग
जगाई
थी।
हिन्दू
कोट
बिल
के
संबंध
में
इनका
था
कि
जिस
तरह
भारतीय
समाज
में
वर्ण-व्यवस्था
में
देश
की
आधी
से
ज्यादा
आबादी
के
साथ
घोर
अन्याय
किया
है,
उसी
तरह
उसमें
महिला
को
भी
उसके
मूलभूत
मान्यताओं
से
वंचित
रखा
है।
इस
असमानता
को
दूर
करने
के
लिए
उन्हांेने
हिन्दू
कोट
बिल
की
संरचना
की
थी,
जिसमें
भारतीय
महिलाओं
में
मायके
और
ससुराल
में
पुरूषों
के
बराबर
हक
प्रदान
किया
जाए।
देश
की
आजादी
में
महिलाआंे
ने
पुरूषों
के
बाराबर
बढ़कर
योगदान
दिया
था
किन्तु
खुद
आजादी
के
साथ
गुलामी
की
जंजीर
और
भेदभाव
से
अपने
को
मुक्त
नहीं
करा
पायी
थी।
डाॅ.
आम्बेडकर
की
दृष्टी
में
भारतीय
स्त्री
दलित
श्रेणी
मंे
आती
थी,
ये
मनोवादी
समाजी
नियमों
के
कारण
अपने
अधिकारों
से
वंचित
थी।
- को नागपुर के दलित वर्ग परिषद में डाॅ. आम्बेडकर का कहना था कि नारी जगत की जिस अनुपात में तरक्की होगी, उसी मापदण्ड से समाज की भी तरक्की होगी। उन्होंने कहा था कि उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली स्त्रियों से कहा था कि:-
-
1. आप
सफाई
मंे
रहना
सीखे।
2. सभी
अनैतिक
प्रवृत्तियों
से
मुक्त
रहे।
3. हिन्दू
भावनाआंे
को
त्याग
दें।
- शादी विवाह की जल्दी न करें, और अधिक संताने पैदा नहीं करें।
-
पत्नी
को चाहिए
की वह
पति के
काम में
एक मत
व एक
सहयोगी के
रूप में
अपना दायित्व
निभाए लेकिन
यदि पति
गुलाम के
रूप में
बर्ताव करे
तो उसका
खुलकर विरोध
करे उसकी
बुरी आदतों
का विरोध
कर समानता
का आग्रह
करना चाहिए।
1955 में
हिन्दू
कोट
बिल
मंे
तबके
की
स्त्रियों
में
अधिकारों
की
दृष्टि
से
मूलभूत
आधार
बनकर
सामने
आया
था,
जिसमें
स्त्रियों
की
सम्मति
से
विवाह,
विच्छेद,
उत्तराधिकार,
गोद
लेने
का
अधिकार
प्रदान
किया
गया
था।
हमारे
यहां
वैवाहिक
संबंध
परंपरागत
मान्यताओं
पर
आधारित
होते
थे,
उनके
द्वारा
पुरूषों
को
विवाह
का
अधिकार
प्रदान
किया
गया।
व्यस्क
स्त्री
को
उसकी
अनुमति
से
विवाह
करने
के
अधिकार
प्रदान
करने
की
वकालत
की
थी।
डाॅ.
आम्बेडकर
के
मनोवादी
विचारों
से
भारतीय
समाज
का
ढाॅंचा
बदल
गया।
उनका
मानना
था
कि
भारतीय
समाज
में
समस्त
स्त्री
की
स्थित
शिक्षा
और
समानता
के
बिना
समाज
का
संास्कृतिक
तथा
आर्थिक
उत्थान
नहीं
हो
सकता।
डाॅ.
आम्बेडकर
का
यही
मानना
था
कि
स्त्री
जातिगत
अस्तित्व,
मंथन
और
धर्म
से
ग्रसित
थी
प्रत्येक
वर्ग
की
स्त्रियांे
की
दशा
एक
समान
थी।
डाॅ.
आम्बेडकर
ने
महिला-पुरूष
एकता
की
अलग
जगायी।
हिन्दू
कोट
बिल
जिसमंे
लड़कियों
को
गोद
लिाया
जा
सकता
था
यह
प्राधिकारी
कट्टरपंथी
पचा
नहीं
पा
रहे
थे,
बहू
विवाह
रोकने
की
बात
सुनते
ही
पुरूष
प्रधान
समाज
में
आज
आग
लग
गई,
स्त्रियों
को
विलासिता
की
वस्तु
समझते
थे
ऐसे
पुरूषों
के
तन-बदन
में
आग
लग
गई
थी।
विध्वा,
पूर्नविवाह
और
उत्पीड़न
को
खत्म
करने
के
धर्म
के
नाम
पर
घोर
विरोध
किया
था।
हिन्दू
कोट
बिल
में
महिलाओं
को
वे
तमाम
अधिकार
दिए
जा
रहे
हैं
जिन्हें
उन्हें
हजारों
सालों
से
वंचित
रखा
गया
था।
यही
कारण
था
कि
हिन्दू
कोट
बिल
का
घोर
विरोध
हुआ
और
महिला
उत्थान
के
नाम
पर
डाॅ.
आम्बेडकर
को
स्तीफा
देना
पड़ा
था।
डाॅ.
आम्बेडकर
के
द्वारा
नारी
सशक्तिकरण
की
जो
चिंगारी
जगाई
गई
थी
वह
अलग
बनकर
बाद
मंे
उभरकर
आयी
और
भारत
सरकार
ने
हिन्दू
कोट
बिल
के
उपबंधो
को
खण्ड-खण्ड
करके
संसद
में
पारित
किया।
आज
हम
जो
हिन्दू
विवाह
अधिनियम,
1955 हिन्दू
उत्तराधिकार
अधिनियम,
1956 हिन्दू
अवयस्क्ता
अधिनियम
और
संरक्षता
अधिनियम,
1956 और
हिन्दू
दत्तक
और
भरण-पोषण
अधिनियम,
1956 पास
हुए।
1956
बाद
मंे
बनाए
गए
और
हिन्दू
विवाह,
उत्तराधिकार,
दत्तक,
भरण-पोषण
और
अवयस्कता
और
संरक्षता
तीनों
क्षेत्रों
में
संहिताबद्ध
किया।
इस
प्रकार
हिन्दू
विधि
का
संहिताबद्ध
होना
डाॅ.
आम्बेडकर
की
देन
थी।
डाॅ.
आम्बेडकर
स्त्रियों
की
शिक्षा
के
पक्ष
में
थे,
उनका
मानना
था
कि
स्त्री
पढ़-लिख
जाए
तो
स्वयं
पिछड़ेपन
से
उभर
जाएंगी
इसलिए
उनके
प्रयास
में
स्त्री
शिक्षा
की
शुरूआत
भारतीय
समाज
में
हुई।
आम्बेडकर
जी
ने
विधानसभा
के
सदस्य
बनकर
राजनीति
मंे
प्रवेश
कर
सर्वप्रथम
1928
में
स्त्री
मजदूरों
को
प्रसूति
अवकाश
देने
संबंधी
मेनेजर
मेत्री
बेनेफीट
बिल
प्रस्तुत
किया
था।
जुलाई
1928
में
कारखानों
में
मजदूर
के
रूप
में
काम
करने
वाली
महिलाओं
को
राहत
देने
के
लिए
बिल
पास
करते
हुए
डाॅ.
आम्बेडकर
का
कहना
था
कि
राष्ट््र
के
हित
मंे
नारी
को
गर्भवती
और
बच्चे
के
जन्म
के
बाद
भी
विश्राम
दिया
जाए
और
इस
बिल
का
सिद्धांत
पूर्ण
रूप
से
उसी
पर
आधारित
है।
महोदय
मैं
यह
कहने
को
बाध्य
हूं
कि
इसका
भार
प्रधान
रूप
से
सरकार
को
वहन
करना
चाहिए।
मैं
इसलिए
कहने
को
बाध्य
हूं
कि
जनहित
के
कार्य
प्रधान
रूप
से
सरकार
का
है।
मैं
यह
स्वीकार
करने
को
तैयार
हूं
कि
सेवायोजक
जो
किसी
नारी
की
सेवा
के
लिए
नियुक्त
करता
है
इस
परिस्थिति
में
नारी
को
ऐसे
लाभ
देने
के
दायित्व
से
पूरी
तरह
स्वतंत्र
है
क्यांेकि
सेवा
नियोजक
विशेष
उधोगों
में
नारी
को
इसलिए
सेवा
के
लिए
नियुक्त
करता
है
कि
वह
देखता
है
कि
पुरूषों
को
सेवा
में
नियुक्त
करने
की
अपेक्षा
नारी
को
नियुक्त
करके
वह
अधिक
लाभ
पाता
है।
इस
बिल
के
बंबई
पे्रसीडेंसी
तक
सीमित
रखाना
अन्यायपूर्ण
है
इसे
पूरे
भारत
के
लिए
विस्तारित
करना
चाहिए
और
भारत
के
अन्य
प्रेसीडंेसी
एवं
राज्यों
को
भी
बंबई
पे्रसीडेंसी
जैसे
सदैव
स्वतंत्र
कर
देना
चाहिए।
तृतीय
गोलमेज
सम्मेलन
में
डाॅ.
आम्बेडकर
के
द्वारा
उच्च
क्षेत्रों
में
मताधिकार
प्रदान
कराया
गया
था।
डाॅ.
आम्बेडकर
के
प्रयासों
से
हिन्दू
नारी
को
पुरूषांे
के
बाराबर
सम्मान
व
अधिकार
प्राप्त
हुए।
बहू
विवाह
को
दण्डित
किया
गया
और
विवाह
को
संस्कृतिक
किया
गया,
न्यायप्रकरण
कराया
स्वछन्द
निर्णय
विवाह
करने
के
प्रावधान
बनाए
गए।
हिन्दू
पुरूष
के
बराबर
स्त्रियों,
विध्वाओं,
माता
को
बराबर
का
अधिकार
दिया।
हिन्दू
पुरूष
की
स्वर्गीय
संपत्ती
और
बराबर
खर्च
नारी
को
दिया
गया।
इस
प्रकार
हिन्दू
नारी
के
उत्थान
में
हिन्दू
कोट
बिल
ने
आधारशिला
रखी।
े
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